जम्मू में बंद हुआ ’दरबार’, अब श्रीनगर में 4 मई को खुलेगा

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: April 29, 2026 13:35 IST2026-04-29T13:35:02+5:302026-04-29T13:35:12+5:30

Jammu-Kashmir:  महाराजा का दरबार अक्तूबर महीने तक कश्मीर में ही रहता था। जम्मू से कश्मीर की दूरी को देखते हुए डोगरा शासकों ने शासन को ही कश्मीर तक ले जाने की व्यवस्था को वर्ष 1947 तक बदस्तूर जारी रखा। 

Darbar Move will continue to haunt those who opposed Article 370 | जम्मू में बंद हुआ ’दरबार’, अब श्रीनगर में 4 मई को खुलेगा

जम्मू में बंद हुआ ’दरबार’, अब श्रीनगर में 4 मई को खुलेगा

Jammu-Kashmir:  संविधान की धारा 370 को हटा दिए जाने के बाद देश से दो संविधान और दो निशान तो चले गए पर डेढ़ सौ साल से चल रही दो राजधानियों की परंपरा अर्थात ‘दरबार मूव’ की परंपरा फिर से उनको सालती रहेगी जो धारा 370 का विरोध करते रहे हैं क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के बाद यह परंपरा पिछले साल से आरंभ हो चुकी है। 

दरबार मूव अर्थात नागरिक सचिवालय की प्रथा वर्ष 2021 में उप राज्यपाल के शासन ने जम्मूवासियों के जबरदस्त विरोध के बावजूद बंद कर दी थी। फिर से 6-6 माह के लिए जम्मू तथा श्रीनगर में नागरिक सचिवालय को खोलने की प्रथा जिसे आम भाषा में ‘दरबार मूव’ कहते हैं, जारी रहेगी। इस बार आज जम्मू में दरबार बंद हो गया है और 4 मई को श्रीनगर में खुलेगा।

दरअसल धारा 370 को हटाए जाने के बाद से ही ‘दरबार मूव’ को लेकर भिन्न प्रकार की अफवाहें उड़ने लगी थीं। जम्मू वाले इस बात को लेकर खुश थे कि अब ‘दरबार मूव’ से मुक्ति मिल जाएगी। दरअसल कहा यह जा रहा था कि जम्मू व श्रीनगर में दो नागरिक सचिवालय बना दिए जाएंगें। पर बड़ी रोचक बात यह है कि केंद्र शासित प्रदेश में राजधानी का कोई प्रावधान नहीं होने के कारण ‘दरबार मूव’ अर्थात राजधानी स्थानांतरण के प्रावधान को कैसे लिया जाए। फिर 2021 में उप राज्यपाल ने 150 साल पुरानी इस प्रथा को तोड़ दिया।

आतंकवाद का सामना कर रहे जम्मू कश्मीर में दरबार मूव की प्रक्रिया को कामयाब बनाना भी एक बहुत बड़ी चुनौती रहती है। इस दौरान कड़ी व्यवस्था के बीच सचिवालय के अपने 35 विभागों, सचिवालय के बाहर के करीब इतने ही मूव कायालयों के करीब पंद्रह हजार कर्मचारी जम्मू व श्रीनगर रवाना होते रहते हैं। उनके साथ खासी संख्या में पुलिस कर्मी भी मूव करते हैं।

जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा पिछले साल सदियों पुरानी ’दरबार मूव’ परंपरा को बहाल करने के फैसले ने पूरे प्रदेश में मिली-जुली प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया था - जिसके तहत सिविल सचिवालय और अन्य सरकारी कार्यालय साल में दो बार श्रीनगर और जम्मू के बीच स्थानांतरित होते हैं।

जम्मू में कई लोगों ने इस कदम का स्वागत किया था और इसे व्यापार, विरासत और प्रशासनिक संतुलन को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक कदम बताया था, वहीं कश्मीर के निवासियों ने डिजिटल युग और ई-गवर्नेंस में भारी निवेश के बीच इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए बड़े पैमाने पर संदेह व्यक्त किया था।

क्या था दरबार मूव

जम्मू कश्मीर में दरबार मूव की शुरूआत महाराजा रणवीर सिंह ने 1872 में बेहतर शासन के लिए की थी। कश्मीर, जम्मू से करीब 300 किमी दूरी पर था, ऐसे में डोगरा शासक ने यह व्यवस्था बनाई कि दरबार गर्मियों में कश्मीर व सर्दियों में जम्मू में रहेगा।

19वीं शताब्दी में दरबार को 300 किमी दूर ले जाना एक जटिल प्रक्रिया थी व यातायात के कम साधन होने के कारण इसमें काफी समय लगता था। अप्रैल महीने में जम्मू में गर्मी शुरू होते ही महाराजा का काफिला श्रीनगर के लिए निकल पड़ता था। महाराजा का दरबार अक्तूबर महीने तक कश्मीर में ही रहता था। जम्मू से कश्मीर की दूरी को देखते हुए डोगरा शासकों ने शासन को ही कश्मीर तक ले जाने की व्यवस्था को वर्ष 1947 तक बदस्तूर जारी रखा। 

जब 26 अक्तूबर 1947 को राज्य का देश के साथ विलय हुआ तो राज्य सरकार ने कई पुरानी व्यवस्थाएं बदल ले लेकिन दरबार मूव जारी रखा।  राज्य में 148 साल पुरानी यह व्यवस्था आज भी जारी है। दरबार को अपने आधार क्षेत्र में ले जाना कश्मीर केंद्रित सरकारों को सूट करता था, इस लिए इस व्यवस्था में कोई बदलाव नही लाया गया था।

Web Title: Darbar Move will continue to haunt those who opposed Article 370

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