Jammu-Kashmir: कश्‍मीर में घटते धान के खेतों के कारण चावल की खेती में लगातार गिरावट

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: April 29, 2026 12:05 IST2026-04-29T12:04:07+5:302026-04-29T12:05:16+5:30

Jammu-Kashmir: लोग बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं या अपनी जमीन को खाली छोड़ रहे हैं। धान की खेती में ज्‍यादा मेहनत लगती है और फायदा कम होता है। यह धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।

Decreasing paddy fields in Kashmir have led to steady decline in rice cultivation | Jammu-Kashmir: कश्‍मीर में घटते धान के खेतों के कारण चावल की खेती में लगातार गिरावट

Jammu-Kashmir: कश्‍मीर में घटते धान के खेतों के कारण चावल की खेती में लगातार गिरावट

Jammu-Kashmir:  धान के खेतों के विशाल विस्तार, जो कभी कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे, धीरे-धीरे सिकुड़ते जा रहे हैं; सरकारी आंकड़े और जमीनी रिपोर्ट, दोनों ही पूरी घाटी में चावल की खेती में लगातार गिरावट का संकेत दे रहे हैं। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जम्मू कश्मीर में धान की खेती का रकबा एक दशक पहले के 1.6 लाख हेक्टेयर से घटकर हाल के वर्षों में लगभग 1.4 लाख हेक्टेयर रह गया है। उत्पादन में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जिसका मुख्य कारण अनियमित मौसम, पानी की घटती उपलब्धता और खेती योग्य जमीन का सिकुड़ना है।

जानकारी के लिए चावल अभी भी घाटी का मुख्य भोजन बना हुआ है, जिसकी पारंपरिक रूप से अनंतनाग, पुलवामा, बडगाम, बारामुल्‍ला और गंदरबल के कुछ हिस्सों जैसे जिलों में खेती की जाती है। हालांकि, बढ़ते शहरी विस्तार और बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं के कारण, उपजाऊ धान की जमीन का बड़े पैमाने पर आवासीय कालोनियों, व्यावसायिक जगहों और कुछ मामलों में फलों के बागों में रूपांतरण हो गया है।

बडगाम के एक किसान का कहना था कि पहले हम अपनी सारी जमीन पर धान उगाते थे, लेकिन अब इसका ज्‍यादातर हिस्सा या तो बेच दिया गया है या उसका इस्तेमाल बदल दिया गया है। मेहनत के मुकाबले इसका फायदा कम है। मजदूरी की लागत बढ़ गई है, और पानी की उपलब्धता अब भरोसेमंद नहीं रही।

पूरे दक्षिण कश्मीर के किसानों ने भी इसी तरह की चिंताएं जाहिर की, खासकर सिंचाई को लेकर। कई किसानों ने बताया कि पारंपरिक नहर प्रणालियां, जो कभी लगातार बर्फबारी और ग्लेशियरों के पिघलने से चलती थीं, अब भरोसेमंद नहीं रहीं।

पुलवामा के एक किसान के बकौल, पहले, पानी हमारे खेतों तक समय पर पहुंच जाता था। अब, कभी-कभी खेती के सबसे जरूरी समय में नहरें सूख जाती हैं। पानी के बिना, धान की खेती एक ऐसा जोखिम बन जाती है जिसे हम उठा नहीं सकते।

जलवायु परिवर्तनशीलता ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। बेमौसम बारिश, लंबे समय तक सूखा पड़ना और बढ़ते तापमान ने बुवाई और कटाई के पारंपरिक चक्रों को बाधित कर दिया है, जिससे पैदावार और उसकी निश्चितता, दोनों में कमी आई है।

उत्तरी कश्मीर के बारामुल्‍ला जिले में एक किसान का कहना था कि धान की खेती से दूर हटने का यह सिलसिला अब शायद ही कभी वापस पलटेगा। लोग बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं या अपनी जमीन को खाली छोड़ रहे हैं। धान की खेती में ज्‍यादा मेहनत लगती है और फायदा कम होता है। यह धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।

Web Title: Decreasing paddy fields in Kashmir have led to steady decline in rice cultivation

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