Bakhtiyarpur Junction: विश्व धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह करने वाले बख्तियार खिलजी के नाम पर बिहार में पटना जिले के बख्तियारपुर शहर और रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की मांग ने जोर पकड़ लिया है. इसका नाम बदलकर 'मगध द्वार' या 'नालंदा' रखने की मांग की जा रही है. मुख्य तर्क यह है कि नाम एक "हमलावर" (बख्तियार खिलजी) के नाम पर है, जिसने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट किया था. इस मांग ने राजनीतिक हलकों से लेकर स्थानीय प्रशासन तक हलचल मचा दी है. इस तरह सूबे की सियासत में एक बार फिर ऐतिहासिक और भावनात्मक मुद्दा गर्मा गया है.
विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), बजरंग दल और भाजपा के संयुक्त तत्वावधान में बख्तियारपुर जंक्शन का नाम बदलकर 'मगध द्वार' रखने की मांग को लेकर परिवर्तन संदेश यात्रा की शुरुआत की है. इसबीच बख्तियारपुर नगर परिषद ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को प्रस्ताव भेजकर शहर का नाम बदलकर “मगध द्वार” करने की मांग की है. नगर परिषद का कहना है कि शहर का मौजूदा नाम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी के नाम पर है. खिलजी ने करीब 800 साल पहले बिहार के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को भारी नुकसान पहुंचाया था.
नगर परिषद और स्थानीय नेताओं का तर्क है कि बख्तियारपुर नाम 12वीं-13वीं सदी के तुर्क सेनापति मुहम्मद बख्तियार खिलजी से जुड़ा है, जिसने नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला कर उसे भारी नुकसान पहुंचाया था. इसी ऐतिहासिक घटना को लेकर लोगों में लंबे समय से असंतोष देखा जाता रहा है. लोगों का कहना है कि आज भी एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन का नाम बख्तियार खिलजी जैसे आक्रांता के नाम पर होना बिहार के लोगों की भावनाओं को आहत करता है. वहीं, यह मुद्दा तब और तेज हुआ जब भाजपा से जुड़े स्थानीय विधायक अरुण कुमार साह का कहना है कि बख्तियारपुर का नाम एक ऐसे ऐतिहासिक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे लोग आक्रांता के रूप में देखते हैं, इसलिए इसे बदलकर मगधद्वार रखा जाना चाहिए ताकि बिहार की गौरवशाली संस्कृति और पहचान को नया सम्मान मिल सके.
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग उठी हो. इससे पहले करीब पांच साल पहले भी तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी शहर का नाम बदलने की मांग की गई थी. उस वक्त भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर ने बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग की थी. लेकिन नीतीश कुमार ने इसे बेतुका बताया था. दरअसल सबसे पहले साल 2004 में इस मुद्दे ने जोर पकड़ा था. उस समय तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने भी नाम बदलने का सुझाव दिया था. इसके बाद साल 2018 में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी इस मुद्दे को उठाया था. अब एक बार फिर नगर परिषद के प्रस्ताव के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है. फिलहाल यह मामला राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर बहस का विषय बन गया है. सरकार की ओर से अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है, लेकिन मांग तेज होने के बाद यह मुद्दा राज्य की सियासत में एक बार फिर केंद्र में आ गया है.
उल्लेखनीय है कि बख्तियार खिलजी का पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बख्तियार खिलजी था. वह 12वीं-13वीं सदी का एक तुर्क अफगान सेनापति था, जो दिल्ली सल्तनत के शुरुआती दौर में एक्टिव रहा. वह कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति था और 1200-1203 ईस्वी के बीच उसने बिहार और बंगाल के कई इलाकों पर मिलिट्री ऑपरेशन्स चलाए. इतिहास के मुताबिक बख्तियार खिलजी ने साल 1203 के आसपास बिहार पर हमला किया और फिर बंगाल की राजधानी नदिया पर कब्जा कर लिया.
कहा जाता है कि उसने अचानक हमला कर लक्ष्मण सेन के महल को अपने कब्जे में ले लिया था. इसके बाद उसने बंगाल में अपनी सत्ता कायम की, लेकिन उसका शासन ज्यादा लंबा नहीं चला. लेकिन बख्तियार खिलजी को सबसे ज्यादा नालंदा विश्वविद्यालय पर हमले के लिए याद किया जाता है.
कई ऐतिहासिक विवरणों में दावा किया गया है कि उसने नालंदा और ओदंतपुरी जैसे बड़े बौद्ध शिक्षा केंद्रों को नुकसान पहुंचाया. इस दौरान बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की हत्या हुई और कई लोगों को वहां से भागना पड़ा. नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश के लिए बख्तियार खिलजी को ही जिम्मेदार माना जाता है.