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"बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं", आप फिर से सुन सकेंगे इस डायलॉग को, ऋषिकेश मुखर्जी की 'आनंद' का बनेगा रीमेक

By आशीष कुमार पाण्डेय | Updated: May 20, 2022 16:27 IST

हिंदी सिनेमा के सदाबहार फिल्म डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' का रीमेक साल 1971 में उसके निर्माता रहे एनसी सिप्पी के पोते समीर राज सिप्पी अपने सहयोगी विक्रम खाखर के साथ मिलकर बनाने जा रहे हैं।

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ठळक मुद्देसाल 1971 में रिलीज हुई सुपरहीट फिल्म 'आनंद' का रिमेक बनने जा रहा है 'आनंद' का रीमेक साल 1971 में उसके निर्माता रहे एनसी सिप्पी के पोते समीर राज सिप्पी बना रहे हैं'आनंद' का डायलॉग "बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं" बेहद मकबूल हुआ था

मुंबई: हिंदी सिनेमा के सदाबहार फिल्म डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी ने साल 1971 में एक फिल्म बनाई थी, जिसका डायलॉग "बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं" बेहद मकबूल हुआ था।

इस फिल्म में उस जमाने के सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ एक पतले-दूबले शख्स ने डॉक्टर भास्कर बनर्जी का किरदार अदा किया था, जो बाद में सदी का महानायक बना और जिसे दुनिया अमिताभ बच्चन के नाम से जानती है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं फिल्म 'आनंद' की। फिल्म में गुलजार के लिए संवाद और गीत 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के सपने चुने' था। इसके साथ में गीतकार योगेश का भी एक गीत 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' था, बेहद फेमस हुआ था और उसके लिए योगेश को फिल्म फेयर का अवॉर्ड भी मिला था। ऋषिकेश मुखर्जी की यह क्लासिक फिल्म अब दोबारा रुपहले पर आने जा रही है।

जी हां, फिल्म 'आनंद' का रीमेक साल 1971 में उसके निर्माता रहे एनसी सिप्पी के पोते समीर राज सिप्पी बनाएंगे और इसमें उनका साथ देंगे विक्रम खाखर। एनसी सिप्पी के पोते राज सिप्पी ने बचाया कि फिल्म की रि-स्क्रिप्टिंग की जा रही है, लेकिन इस रिमेक को कौन डायरेक्ट करेगा अभी तक यह चय नहीं हुआ है।

फिल्म 'आनंद' में मुख्य किरदार अदा किये राजेश खन्ना लिम्फ सार्कोमा नाम की जानलेवा बीमारी के पीड़ित हैं। वो इलाज के लिए दिल्ली से मुंबई अपने एक डॉक्टर दोस्त के पास पहुंचते हैं और वहीं पर उनकी मुलाकात डॉक्टर भास्कर बनर्जी आनी अमिताभ बच्चन से होती है।

फिल्म के अंत में 'आनंद' की मौत हो जाती है और उसके साथ बिताये पल को याद करते हुए डॉक्टर भास्कर बनर्जी अपनी लिखी डायरी को 'आनंद' नाम की किताब में तब्दील कर देते हैं। कैंसर से मरते आनंद और डॉक्टर बनर्जी के जीवन के सूनेपन को रेखांकित करती हुई ऋषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म को हिंदी सिनेमा के क्लासिक फिल्मों में शुमार किया जाता है। फिल्म के गीतों को अमर बनाने का श्रेय गीताकर गुलजार और योगेश के साथ संगीतकार सलिल चौधरी ने भी जाता है, जिनकी धुनों ने आनंद के हर गीत को अमर कर दिया।

रिमेक बनाने के संबंध में जानकारी देते हुए राज सिप्पी कहते हैं, "साल 1971 में बनी फिल्म 'आनंद' में पर्दे पर फिल्माई गई किरदारों की संवेदनाओं और भावनाओं को ध्यान में इस फिल्म को आज फिर से युवाओं के बीच पेश किये जाने की जरूरत है। फिल्म की कहानी साल 1971 में जितनी प्रासंगित थी वो मौजूदा दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। यही कारण है कि हमने इस फिल्म का रिमेक बनाने का फैसला किया। 

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