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रहीस सिंह का ब्लॉग: युआन के सहारे बड़े गेम की रणनीति में चीन

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: December 2, 2023 11:52 IST

चीन ने पहले शंघाई और बीजिंग में ऐसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की जो कम-से-कम एशिया और अफ्रीका में न्यूयॉर्क स्थित वित्तीय संस्थाओं का विकल्प बन सकें। जापान और अमेरिका ने इन्हें चीन के सॉफ्ट पॉवर वेपन के रूप में देखा भी।

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ठळक मुद्दे 2008 में अमेरिका को सब-प्राइम क्षेत्र से उपजे संकट का सामना करना पड़ा2003 के इराकी युद्ध के पीछे पेट्रो डॉलर बनाम यूरो का टकराव भी एक अहम कारण था2008 अमेरिका के लिए लाइन ऑफ डिमार्केशन का वर्ष था

नई दिल्ली:  दुनिया पुनः अशांति से गुजरती हुई दिख रही है। यह अशांति उन संघर्षों का ‘बाय प्रोडक्ट’ है जो युद्ध के मैदान में नहीं लड़े जा रहे। ये पूंजीवाद के टापुओं पर स्थापित वित्त और मुद्रा बाजार में लड़े जा रहे हैं। ये टकराव अथवा संघर्ष दिखने में साधारण हो सकते हैं लेकिन इनके निहितार्थ गहरे होते हैं और परिणाम व्यापक।

हम 21वीं सदी की शुरुआत में चलते हैं। वर्ष 2001 में एक घटना घटी जो विश्वव्यवस्था को बदलने वाली थी। इसे पूरी दुनिया ने देखा और महसूस भी किया लेकिन क्या यह विश्वव्यवस्था को बदल पाई? संभवतः नहीं। उसकी शुरुआत तो सही अर्थों में वर्ष 2008 से हुई जब अमेरिका को सब-प्राइम क्षेत्र से उपजे संकट का सामना करना पड़ा। इसी तरह से 2020 को देखें जिसमें कोविड महामारी ने दुनिया की धुरी को ही बदलने का काम किया। यह 9/11 अथवा अरब स्प्रिंग से अधिक प्रभावशाली थी क्योंकि इसमें हुई जनहानि विश्वयुद्ध की विभीषिका से कहीं अधिक थी। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार के प्रति अंततः दुनिया मौन साध गई। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीते दो या तीन दशकों में जो भी संघर्ष अथवा लड़ाइयां हुईं उनके बाहरी पक्ष को तो सभी ने देखा लेकिन उनके अदृश्य और वास्तविक पक्षों की या तो अनदेखी की गई या फिर देखने का साहस नहीं किया गया। इसी वजह से 9/11 के सच का खुलासा भी नहीं हुआ और इराक युद्ध का भी। 

यह बात भी महत्वपूर्ण नहीं रह गई कि आखिर वर्ष 2003 में अमेरिकी सेनाएं काबुल से बगदाद की ओर क्यों चली गईं, इस्लामाबाद की ओर क्यों नहीं।2003 के इराकी युद्ध, जो सही अर्थों में अमेरिकी युद्ध था, के पीछे पेट्रो डॉलर बनाम यूरो का टकराव भी एक अहम कारण था। इराक उस समय पेट्रो यूरो का विदेशी लेनदेन में इस्तेमाल कर डॉलर को चुनौती देने लगा था। यह डॉलर के अस्तित्व की बात ही नहीं थी, अमेरिका के अस्तित्व की भी थी। इसलिए इराक की गर्दन जल्द मरोड़ना और पूरी दुनिया को संदेश देना जरूरी हो गया था अन्यथा और भी इसका अनुसरण कर सकते थे। इराकी युद्ध ने सद्दाम का अंत कर दिया, यह सभी ने देखा लेकिन ‘ऑप्टिमम करेंसी’ कहा जाने वाला यूरो धराशायी हो गया और डॉलर विजेता- यह शायद नहीं देखा गया। इसके बाद तो मानो अमेरिका ‘विक्ट्री टैक्स’ वसूलने का अधिकार पा गया।  लेकिन इसका माइक्रो व्यू पेश नहीं किया गया. आखिर इसकी वजह क्या थी?

दरअसल हम जब ऐसे विषयों का अध्ययन करते हैं तो बहुत सीधे सपाट अर्थ या निष्कर्ष निकालते हैं परंतु हमें यह जान लेना चाहिए कि विश्व व्यवस्थाओं में परिवर्तन सामान्य कारणों या संघर्षों के परिणाम नहीं होते। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि वैश्विक रणनीति, संघर्ष और पहलों में जो दिखता है उसका सच कुछ और होता है अन्यथा 1960 के दशक में अमेरिका के तत्कालीन प्रेसिडेंट आइजनहावर यह कदापि न कहते कि निर्णय लेकर मुझे अवगत कराया जाता है। वास्तविक शक्तियां तो पर्दे के पीछे होती हैं।

2008 अमेरिका के लिए लाइन ऑफ डिमार्केशन का वर्ष था। इसी वर्ष अमेरिकी सब-प्राइम संकट के बाद विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों ने घोषणा कर दी कि अब ग्लोबल इकोनाॉमी डि-कपल हो चुकी है. आगे का नेतृत्व अमेरिका नहीं बल्कि एशिया करेगा। एशिया का अर्थ चीन से लगाया गया। यहीं से चीन ने नई महत्वाकांक्षाएं प्रदर्शित करनी आरंभ कर दीं। यह एक नए टकराव की शुरुआत का संकेत था। ‘करेंसी वार’  और ‘ट्रेड वार’ इसी के परिणाम रहे। यही अब डॉलर और युआन (रेनमिंबी) के बीच दिख रहा है। यद्यपि अभी रेनमिंबी डॉलर से बहुत दूर है लेकिन चीन इसे सामर्थ्य देने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। चीन ने पहले शंघाई और बीजिंग में ऐसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की जो कम-से-कम एशिया और अफ्रीका में न्यूयॉर्क स्थित वित्तीय संस्थाओं का विकल्प बन सकें। जापान और अमेरिका ने इन्हें चीन के सॉफ्ट पॉवर वेपन के रूप में देखा भी।

एक बात और, चीन जिस तरह से ‘खुले ऋण की खिड़की’ (विश्व बैंक के लिए प्रयुक्त) बनकर कार्य कर रहा है और विभिन्न इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के जरिये  कैपिटलाइजेशन कर रहा है वह रेनमिंबी के रणनीतिक विस्तार का हिस्सा है। यही नहीं चीन के व्यापारिक साझेदार युआन (रेनमिंबी) की तरफ आकर्षित होते दिख रहे हैं, विशेषकर वे देश अधिक जो अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं. इसमें अर्जेंटीना, ब्राजील, बोलीविया और रूस जैसे देश भी हैं जो अमेरिकी वित्त और मुद्रा बाजार की नीतियों के कारण चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. ये विकल्प के तौर पर चीन की ओर देख रहे हैं।

इस प्रकार से आज की दुनिया उत्तर और दक्षिण के आधार पर नहीं बल्कि डॉलर और रेनमिंबी में विभाजित होती दिख रही है। हालांकि रास्ता बहुत लंबा है और चीन के समक्ष चुनौतियां और हिचकिचाहटें अधिक। लेकिन वह कुछ ऐसे उपाय अपना रहा है जो इस अवरोध को दूर करने में सहायक हो सकता है। इस दिशा में पहला उपाय है चीनी सेंट्रल बैंक द्वारा जारी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी), जिसका इस्तेमाल चीन सरकार की निगरानी में विभिन्न देशों के बीच लेनदेन में किया जा रहा है। इसे एक नई पहल के रूप में देखा जा सकता है। दूसरा उपाय है चीनी मुद्रा (यूआन/रेनमिंबी) में नगदी व्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संयुक्त पहल का। इसके तहत एक कोष की स्थापना होगी जिसमें इंडोनेशिया, मलेशिया, हांगकांग मौद्रिक प्राधिकरण, सिंगापुर, चिली जैसे देश 1.5 करोड़ रेनमिंबी अथवा डाॅलर के समतुल्य धनराशि प्रदान करेंगे। इसमें चीन वित्तीय प्रत्याभूतिकर्ता (गारंटर) की भूमिका में होगा। 

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