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अवधेश कुमार का ब्लॉग: हार के बाद भी आईएस का खतरा कायम

By अवधेश कुमार | Updated: April 4, 2019 07:24 IST

आईएस ने अपने को कमजोर होते देख लोन वूल्फ यानी अकेले जो भी संसाधन मिले उसी से हमला करने का जो विचार दिया वह पूरी दुनिया में फैल चुका है. फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, बेल्ज्यिम, अमेरिका आदि देशों में ऐसे हमले हो चुके हैं.

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इस वर्ष के लिए या आने वाले कई वर्षो के लिए दुनिया की यह सबसे बड़ी खबर हो सकती है. सीरिया में अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन सेना ने आईएस के कब्जे से अंतिम क्षेत्न को मुक्त करा लेने की घोषणा कर दी है. सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस या एसडीएफ ने इस्लामिक स्टेट का आखिरी गढ़ कहे जाने वाले बागूज गांव पर जैसे ही पीला झंडा फहराया, उसकी तस्वीरें फ्लैश हुई चारों तरफ प्रसन्नता की लहर फैल गई. यह दुनिया भर से आए जेहादी लड़ाकों का अंतिम  गढ़ था. 

एसडीएफ ने कहा कि आज सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस आधिकारिक तौर पर इस्लामिक स्टेट के खिलाफ सभी लड़ाइयों के खत्म होने और जीत का ऐलान करती है. एसडीएफ ने ऐलान किया कि पांच साल पहले घोषित खिलाफत को अंतत: नष्ट कर दिया गया है. आईएस आतंकवादियों ने अपने अंतिम गढ़ को बचाने के लिए भीषण संघर्ष किया जिसमें प्रत्यक्ष के साथ गुरिल्ला लड़ाई एवं आत्मघाती हमले भी शामिल हैं. 

मानवाधिकार के सीरियाई प्रेक्षक के मुताबिक, कई हफ्तों के भीषण युद्ध में 630 नागरिक और करीब 1600 आईएस के आतंकवादी मारे गए. यह संख्या अंतिम नहीं है. कितने लोग मारे गए इसका सही आंकड़ा इसलिए भी नहीं मिल सकता कि भयानक विस्फोटों से निकले आग की लपटों में अनेक जलकर राख हो गए होंगे. 

हालांकि आईएस अपने नाम से बहुत पुराना संगठन नहीं था. अल बगदादी इराक में अमेरिकी विजय के खिलाफ संघर्ष कर रहे अल कायदा का प्रमुख था. 2006 से उसने आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक संगठन बनाकर जिस तीक्ष्णता से पुलिस, सेना से जुड़े ठिकानों पर हमला करना शुरू किया उससे उसकी ओर युवाओं का झुकाव हुआ और भारी संख्या में लड़ाके शामिल होने लगे. बावजूद उसे कल्पना के अनुरूप सफलता नहीं मिली. तब तक सीरिया में गृहयुद्ध आरंभ हो चुका था. उसने अपने संगठन का नाम आईएसआईएस यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया कर दिया. वहां फ्री सीरियान आर्मी या एफएसए को अमेरिका और उसके साथी देशों की सहानुभूति तथा हल्का सहयोग प्राप्त था. 

यह लड़ाई अत्यंत भयानक थी. अमेरिका को यहां हवाई हमलों से एसडीएफ की मदद करनी पड़ी. आईएस ने जिस तरह संगठित और हर तरह के हथियारों से लैस सैन्य बल से लंबा लोहा लिया उसी से पता चलता है कि यह वैचारिक और संघर्ष दोनों दृष्टियों से कितना सशक्त संगठन था. हालांकि औपचारिक घोषणा के एक दिन पूर्व ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐलान किया था कि इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी अब सीरिया के किसी भी क्षेत्न में मौजूद नहीं हैं. हालांकि ट्रम्प पहले भी ऐसा दावा करते रहे. 

उदाहरण के लिए 7 फरवरी 2019 को उन्होंने कहा कि सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट का जिन इलाकों पर कब्जा था, उन्हें अगले हफ्ते तक आईएस के नियंत्नण से सौ प्रतिशत आजाद करा लिया जाएगा. दिसंबर 2018 में तो उन्होंने घोषणा कर दिया कि सीरिया में जिहादियों को हरा दिया गया है और 30 दिनों के अंदर सीरिया में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया जाएगा. सेना वापसी की उनकी घोषणा का विरोध होने लगा. 

कई प्रमुख रक्षा अधिकारियों के इस्तीफे और विदेशी सहयोगियों की कड़ी आलोचना के बाद सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रि या को धीमा कर दिया गया. इसका मतलब यह है कि आईएस के बचे हुए आतंकवादियों के बारे में एकदम सटीक सूचना का अभाव था. अमेरिका ने इससे सबक लेते हुए अब अपनी योजना में बदलाव किया है. आतंकवादियों से इलाकों को मुक्त करा देने भर से अभियान समाप्त नहीं हो जाता. भागे आतंकवादी इराक के शहरों तथा सीरिया के रेगिस्तान में छिपे हैं जो हमले करते रहते हैं. आईएस नाइजीरिया से लेकर फिलिपींस तक सक्रि य हैं. अल बगदादी ओसामा बिन लादेन की तरह लापता है. 

अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमला करने के बाद लादेन को तलाशने में साढ़े नौ वर्ष लग गए. उम्मीद करनी चाहिए कि अल बगदादी को पाकिस्तान जैसा कोई देश छिपने के लिए नहीं मिलेगा. बगदादी के इस्लाम के लिए संघर्ष करने की विचारधारा को विश्व भर के युवाओं का जो समर्थन मिला वह खत्म नहीं हुआ है. 

आईएस ने अपने को कमजोर होते देख लोन वूल्फ यानी अकेले जो भी संसाधन मिले उसी से हमला करने का जो विचार दिया वह पूरी दुनिया में फैल चुका है. फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, बेल्ज्यिम, अमेरिका आदि देशों में ऐसे हमले हो चुके हैं. अफ्रीकी देशों में आतंकवादी हमलों की संख्या बढ़ने में भी आईएस की सीधी या उसकी विचारधारा की भूमिका रही है. इस नाते खतरा अभी कायम है. जिस तरह से अपने कब्जे वाले क्षेत्नों को अपनी दरिंदगी से बर्बाद कर दिया है, उनके पुन:निर्माण, भागे हुए करीब एक करोड़ लोगों की वापसी एवं पुनर्वास तथा वे फिर सिर न उठा सकें इसके उपाय करने होंगे.

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