Jammu-Kashmir: कश्मीर में नई समस्या, मादा पापुलर पेड़ों से निकलने वाले बीज वाले रेशे बीमारियों को दे रहे न्यौता
By सुरेश एस डुग्गर | Updated: May 9, 2026 10:13 IST2026-05-09T10:13:14+5:302026-05-09T10:13:30+5:30
Jammu-Kashmir: इससे कई इलाकों का रूप-रंग खराब हो जाता है, और साथ ही स्थानीय लोगों में सांस से जुड़ी समस्याओं का डर भी पैदा होता है।

Jammu-Kashmir: कश्मीर में नई समस्या, मादा पापुलर पेड़ों से निकलने वाले बीज वाले रेशे बीमारियों को दे रहे न्यौता
Jammu-Kashmir: कश्मीर एक नई समस्या से पिछले कुछ दिनों से जूझ रहा है। हालांकि यह कोई नई समस्या नहीं है बल्कि कई साल पुरानी है पर इस पर इसका प्रभाव कुछ ज्यादा ही दिख रहा है। दरअसल कश्मीर में रूसी मादा पापुलर पेड़ों से निकलने वाले बीज वाले रेशे बीमारियों को न्यौता दे रहे हैं।
यह सच है कि गर्मियों की राजधानी श्रीनगर में पिछले कुछ सप्ताह से एक जानी-पहचानी, लेकिन परेशान करने वाली मौसमी घटना देखने को मिल रही है। रूसी पापुलर पेड़ों से निकलने वाले रुई जैसे रोएं या पराग कण आस-पड़ोस में उड़ते हुए सड़कों, छतों और जलमार्गों को ढक रहे हैं।
हवा में उड़ने वाले ये गुच्छे, जिन्हें अक्सर लोग पराग कण समझ लेते हैं, असल में मादा पापुलर पेड़ों से निकलने वाले बीज वाले रेशे होते हैं। वसंत के मौसम में ये रेशे अब अपने चरम पर हैं।
डलगेट से लेकर हजरतबल और हरवान के बाहरी इलाकों तक, निवासी ऐसे नजारों का वर्णन कर रहे हैं जो हल्की बर्फबारी जैसे लगते हैं; फुटपाथों और लान में सफेद रोएं तेजी से जमा हो रहे हैं। देखने में भले ही यह नजारा आकर्षक हो, लेकिन इसके फैलने से श्रीनगर के कई लोगों में चिंता पैदा हो गई है, खासकर उन लोगों में जिन्हें सांस से जुड़ी समस्याएं हैं।
हजरतबल के एक निवासी रियाज अहमद का कहना था कि ऐसा लगता है जैसे अप्रैल में बर्फबारी हो रही हो। हर सुबह हमें अपने अहाते और बाहर की सड़क की सफाई करनी पड़ती है। यह हर जगह जम जाता है—गाड़ियों पर, दुकानों के सामने, और यहां तक कि घरों के अंदर भी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ये रोएं न केवल सफाई का लगातार बोझ बढ़ाते हैं, बल्कि सार्वजनिक जगहों पर गंदगी का एहसास भी पैदा करते हैं। रुई जैसी इस सामग्री के ढेर फुटपाथों और नालियों के किनारे जमा हो जाते हैं, जो अक्सर धूल और कूड़े-कचरे के साथ मिल जाते हैं। इससे कई इलाकों का रूप-रंग खराब हो जाता है, और साथ ही स्थानीय लोगों में सांस से जुड़ी समस्याओं का डर भी पैदा होता है।
इस मुद्दे ने कश्मीर में रूसी पापुलर पेड़ों की मौजूदगी को लेकर चल रही एक पुरानी बहस को फिर से हवा दे दी है। साल 2015 में, जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने जन स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए अधिकारियों को इन पेड़ों को धीरे-धीरे हटाने का निर्देश दिया था। समय-समय पर चलाए गए अभियानों के बावजूद, श्रीनगर के नजारों में आज भी ऐसे कई पेड़ दिखाई देते हैं।