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अफगानिस्तान में भारत और पाक की भूमिका, वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: June 23, 2021 16:59 IST

ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और उन्हीं के पाकिस्तानी समकक्ष मोईद यूसुफ की भेंट की संभावना.

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ठळक मुद्देदुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक होने जा रही है. अफगानिस्तान से सितंबर में अमेरिकी फौजों की वापसी होगी. अमेरिकी फौज की वापसी होते ही काबुल पर तालिबान का कब्जा हो जाएगा और उनका वहां जीना हराम हो जाएगा.

अफगानिस्तान-संकट पर विचार करने के लिए इस सप्ताह में दो बड़ी घटनाएं हो रही हैं.

एक तो अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी का वॉशिंगटन जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिलना और दूसरी, ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और उन्हीं के पाकिस्तानी समकक्ष मोईद यूसुफ की भेंट की संभावना.

दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक होने जा रही है. इन दोनों भेंटों का महत्व अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए अत्यधिक है ही, दक्षिण एशिया की शांति और सहयोग के लिए भी है.  अफगानिस्तान से सितंबर में अमेरिकी फौजों की वापसी होगी. इस खबर से ही वहां उथल-पुथल मचनी शुरू हो गई है. लोगों में घबराहट फैल रही है.

उन्हें डर है कि अमेरिकी फौज की वापसी होते ही काबुल पर तालिबान का कब्जा हो जाएगा और उनका वहां जीना हराम हो जाएगा. तालिबान ने 40 नए जिलों पर कब्जा कर लिया है. लगभग आधे अफगानिस्तान में उनका बोलबाला है. वे ज्यादातर गिलजई पठान हैं. अफगानिस्तान के ताजिक, उजबेक, हजारा, शिया और मू-ए-सुर्ख लोग परेशान हैं.

उनमें से ज्यादातर गरीब और मेहनतकश लोग हैं. उनके पास इतने साधन नहीं हैं कि वे विदेशों में जाकर बस सकें. अफगान-फौज में भी खलबली मची हुई है. काबुल में जिसका भी कब्जा होगा, फौज को अपना रंग पलटते देर नहीं लगेगी. ऐसे में काबुल से 13 साल तक राज करनेवाले पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति का सारा दोष अमेरिका के सिर मढ़ रहे हैं जबकि वर्तमान राष्ट्रपति गनी इसीलिए वॉशिंगटन जा रहे हैं कि वे अमेरिकी फौजों की वापसी को रुकवा सकें.

दुशांबे में भारत-पाक अधिकारी अगर मिले तो उनकी बातचीत का यही सबसे बड़ा मुद्दा होगा. पाकिस्तान अब भी तालिबान की तरफदारी कर रहा है. उसने अमेरिका को अपने यहां ऐसे सैनिक हवाई अड्डे बनाने से मना कर दिया है, जिनसे अफगानिस्तान में होनेवाले तालिबान हमले का मुकाबला किया जा सके. पाकिस्तान बड़ी दुविधा में है.

उसके विदेश मंत्नी शाह महमूद कुरैशी ने अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को जरूरत से ज्यादा  बताया है. यदि वास्तव में ऐसा है तो पाकिस्तान के नेताओं से मैं कहता हूं कि वे हिम्मत करें और अफगानिस्तान में पाकिस्तान और भारत की फौजों को संयुक्त रूप से भेज दें.

पाकिस्तान यदि सचमुच आतंकवाद का विरोध करता है तो इससे बढ़िया पहल क्या हो सकती है? क्या तालिबान अपने संरक्षकों पर हमला करेंगे? भारत और पाकिस्तान मिलकर वहां निष्पक्ष आम चुनाव करवाएं. जिसे भी अफगान की जनता पसंद करे उसे वह चुन ले.

टॅग्स :अफगानिस्तानदिल्लीपाकिस्ताननरेंद्र मोदीइमरान खानजो बाइडनतालिबान
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