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विंटर ओलंपिक: बर्फ-गर्मी के बीच मुकाबला!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 22, 2026 07:32 IST

अमेरिका और यूरोप में स्की सीजन पहले ही छोटा हो चुका है. कई अंतरराष्ट्रीय स्की प्रतियोगिताएं हाल के वर्षों में सिर्फ इसलिए रद्द करनी पड़ीं क्योंकि बर्फ नहीं थी या तापमान बहुत ज्यादा था.

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निशांत सक्सेना

फरवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेजो में विंटरओलंपिक की शुरुआत होगी, तब खेल सिर्फ एथलीटों के बीच नहीं होगा. मुकाबला होगा बर्फ और बढ़ती गर्मी के बीच. ताजा वैज्ञानिक विश्लेषण साफ संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब विंटरओलंपिक जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक प्रतियोगिताओं को भी चुनौती देने लगा है.कॉर्टीना द’आम्पेजो, जिसने 1956 में भी विंटर ओलंपिक की मेजबानी की थी, आज वैसा ठंडा नहीं रहा. बीते करीब 70 वर्षों में यहां फरवरी का औसत तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है.

पहले जहां फरवरी में औसत तापमान करीब माइनस 7 डिग्री सेल्सियस रहता था, अब वह शून्य के आसपास पहुंच गया है. नतीजा यह कि बर्फ की मोटाई भी घट रही है. शोध बताते हैं कि 1970 के दशक से 2019 तक यहां बर्फ की औसत गहराई 15 सेंटीमीटर कम हो चुकी है. हालात ऐसे हैं कि 2026 के खेलों के लिए इटली को 30 लाख क्यूबिक यार्ड से ज्यादा कृत्रिम बर्फ तैयार करनी पड़ेगी. यानी ऊंचे आल्प्स में होने के बावजूद प्राकृतिक बर्फ पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

यह स्थिति सिर्फ आयोजन की लागत नहीं बढ़ाती, बल्कि खेलों की निष्पक्षता और खिलाड़ियों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है. जब तापमान पर्याप्त ठंडा न हो तो बर्फ जम नहीं पाती, सतह गीली और असमान हो जाती है और चोट का खतरा बढ़ जाता है. यह संकट सिर्फ इटली तक सीमित नहीं है. 1950 के बाद जिन 19 शहरों ने विंटर ओलंपिक की मेजबानी की है, वे सभी आज पहले से ज्यादा गर्म हो चुके हैं.

औसतन इनमें तापमान 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है. विंटर पैरालंपिक की तस्वीर और भी चिंताजनक है. ये खेल आमतौर पर मार्च में होते हैं, जब मौसम और गर्म होता है. अनुमान है कि 2050 तक दुनिया के सिर्फ एक चौथाई संभावित मेजबान शहर ही ऐसे रह जाएंगे, जहां पैरालंपिक के लिए भरोसेमंद बर्फ और तापमान मिल सके. एक हालिया अध्ययन बताता है कि अगर मौजूदा उत्सर्जन रुझान जारी रहे, तो सदी के अंत तक विंटर पैरालंपिक जैसे आउटडोर खेल लगभग नामुमकिन हो सकते हैं.

पहले जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा संभावित मेजबान शहर सुरक्षित माने जाते थे, वहीं आने वाले दशकों में यह संख्या तेजी से घटेगी.

इस बदलते मौसम का असर खिलाड़ियों की तैयारी पर भी दिखने लगा है. स्नोबोर्डिंग और स्कीइंग जैसे खेलों के एथलीट अब ‘बर्फ की तलाश’ में एक जगह से दूसरी जगह भटकने को मजबूर हैं. अमेरिका और यूरोप में स्की सीजन पहले ही छोटा हो चुका है. कई अंतरराष्ट्रीय स्की प्रतियोगिताएं हाल के वर्षों में सिर्फ इसलिए रद्द करनी पड़ीं क्योंकि बर्फ नहीं थी या तापमान बहुत ज्यादा था.

आयोजक संस्थाएं टिकाऊ खेलों की बात जरूर कर रही हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का दावा है कि 2030 से ओलंपिक खेल ‘क्लाइमेट पॉजिटिव’ होंगे. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अगर वैश्विक तापमान यूं ही बढ़ता रहा तो सिर्फ बेहतर प्रबंधन से समस्या हल नहीं होगी.

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