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प्रकृति के प्रचंड होते मिजाज को कब समझेंगे हम ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 3, 2025 10:19 IST

भूजल स्तर का भी हमने इतना ज्यादा दोहन कर लिया है कि अकाल या सूखे की स्थिति में हमें उससे कुछ खास मदद नहीं मिलेगी.

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इस साल देश में मानसून की गजब की तेजी के साथ एंट्री हुई. आम तौर पर जून के पहले या दूसरे हिस्से में आने वाला मानसून देश के कई हिस्सों में नौतपा के पहले ही पहुंच गया. इससे भीषण गर्मी से बेहाल लोगों ने राहत की सांस जरूर ली, लेकिन देश के पूर्वोत्तर के हिस्सों में यह जो अपना रौद्र रूप दिखा रहा है, वह स्तब्ध कर देने वाला है.

असम, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग तीन दर्जन  लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हैं. बाढ़ के कारण बेघर होने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है. सिक्किम में जहां कई जगहों पर जमीन धंस गई, वहीं मणिपुर में सैकड़ों घर ढह गए. मिजोरम में भी कई स्थानों पर भूस्खलन होने की खबर है.

असम में तो 1 जून को सिलचर शहर में 24 घंटे के भीतर 415.8 मिमी बारिश दर्ज की गई, जिसने कहा जा रहा है कि पिछले 132 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. इससे पहले 1893 में एक दिन में 290.3 मिमी बारिश का रिकॉर्ड दर्ज था, जिसे ताजा बारिश ने बहुत पीछे छोड़ दिया है. हालांकि पूर्वोत्तर में भारी बारिश कोई नई बात नहीं है, यहां की जलवायु ही ऐसी है कि भरपूर मानसूनी बारिश होती है. लेकिन अब कम समय में ही होने वाली विकराल बारिश बाढ़ और भूस्खलन का कारण बनते हुए लोगों पर कहर बरपा रही है.

जलवायु परिवर्तन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अवैध खनन को इसका सबसे बड़ा कारण बताया जाता है. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनद झीलों का जलस्तर बढ़ रहा है और इनके बारिश या भूस्खलन में टूटने का खतरा बढ़ गया है. दरअसल पर्यावरणविद्‌ तो बहुत पहले से हमें जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति आगाह करते रहे हैं लेकिन आपदा जब तक सामने दिखाई न देने लगे, तब तक शायद हम सचेत नहीं होते हैं!

दुर्भाग्य से जलवायु परिवर्तन ऐसी चीज नहीं है जिसे बिगाड़ने या सुधारने की कोशिशों के परिणाम तत्काल नजर आएं. इस साल बहुत पहले और भयंकर बरसात का प्रमुख कारण समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि माना जा रहा है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण महासागरों का तापमान बढ़ रहा है, जिससे वायुमंडल में नमी बढ़ती है और बादल जल्दी बनते हैं. सौभाग्य से पिछले कुछ वर्षों से कुल मिलाकर मानसून हमारा साथ देता आ रहा है जिससे फसल अच्छी हो रही है और दुनिया में चल रही उथल-पुथल के बीच भी हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर चल रही है. लेकिन यह सौभाग्य हमेशा कायम नहीं रहेगा. भूजल स्तर का भी हमने इतना ज्यादा दोहन कर लिया है कि अकाल या सूखे की स्थिति में हमें उससे कुछ खास मदद नहीं मिलेगी.

जंगलों का हम सफाया करते जा रहे हैं और शहरों में कांक्रीट के जंगल उगा रहे हैं जिससे बरसात का पानी जमीन में समा नहीं पाता और व्यर्थ बह जाता है. हम मनुष्यों का शरीर इस तरह के इकोसिस्टम या पारिस्थितिकी तंत्र का आदी नहीं है कि चरम जलवायु में भी अपने आपको ढाल सके. इसीलिए हम न तो हद से ज्यादा गर्मी सहन कर पाते हैं, न ठंडी.

जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण अब गर्मी भी बेहिसाब पड़ेगी और ठंडी भी. बारिश भी खूब जमकर होगी और सूखा भी उतना ही भयानक पड़ेगा. काश, हमने पर्यावरण  विशेषज्ञों की चेतावनियों पर समय रहते ध्यान दिया होता! लेकिन अभी भी अगर हम मनुष्यों को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो इस ओर ध्यान दिए बिना कोई और विकल्प नहीं है.

टॅग्स :मानसूनForest Departmentअसममणिपुरकेरल
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