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हेमधर शर्मा ब्लॉग: अपने भीतर के रावण को मारने में मददगार किताबों का हथियार

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: August 28, 2024 10:40 IST

सरकारें अगर मुफ्त का माल बांटने के बजाय हर गांव में, शहरों के हर मुहल्ले में पुस्तकालय खोलें तो समाज का बहुत भला हो सकता है।

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एक ऐसे दौर में, जबकि दुनियाभर में लड़ाई-झगड़े, मार-काट, रेप-गैंगरेप जैसे अपराधों का बोलबाला दिखाई देता है, कुछ खबरें ऐसी भी हैं जो उम्मीद जगाती हैं।अब जैसे सोलापुर के कैलाश काटकर के अनोखे सैलून को ही लें, जहां कटिंग या शेविंग कराने के पहले ग्राहकों के लिए किसी किताब के कुछ पन्ने पढ़ना अनिवार्य है। कैलाश ने सैकड़ों किताबें अपने सैलून की अलमारियों में जमा कर रखी हैं और चाहते हैं कि अपनी बारी का इंतजार करने वाले ग्राहक मोबाइल देखने में समय नष्ट करने के बजाय किताब पढ़ें।

अच्छी किताबों में यह क्षमता होती है कि यदि कोई दो-चार पृष्ठ भी पढ़ ले तो फिर बिना पूरी किताब पढ़े रह नहीं सकता। इसलिए नियमित ग्राहक उनकी दुकान से किताबें पढ़ने के लिए घर भी ले जाते हैं। इसी तरह तमिलनाडु के थूथुकड़ी में सैलून चलाने वाले पोन मरियप्पन ने भी अपने सैलून में मिनी लाइब्रेरी खोल रखी है। गरीबी की वजह से मरियप्पन खुद तो आठवीं क्लास से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके, लेकिन पढ़ने की आदत बनी रही और उन्हें लगा कि क्यों न अपने सैलून में ही लाइब्रेरी बनाई जाए। उन्होंने भी अपने सैलून में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर बैन लगा रखा है।

तकनीकी विकास मनुष्य जाति की प्रगति में बहुत बड़ा योगदान दे रहा है, लेकिन नुकसान भी कम नहीं पहुंचा रहा। दरअसल यह दोधारी तलवार की तरह है। अच्छे मनुष्यों के लिए जो मोबाइल फोन ज्ञान का अगाध स्रोत साबित होता है, उसी मोबाइल से संजय रॉय जैसे नराधम पोर्न देखने के आदी बनकर रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराध कर डालते हैं। यह भी सच है कि कोई मनुष्य जन्मजात बुरा नहीं होता। उसे अच्छे संस्कार देने का काम समाज का होता है और किताबें इस काम में सर्वाधिक मददगार सिद्ध होती हैं। सरकारें अगर मुफ्त का माल बांटने के बजाय हर गांव में, शहरों के हर मुहल्ले में पुस्तकालय खोलें तो समाज का बहुत भला हो सकता है।

दुर्भाग्य से पुस्तकों के प्रेमी सरकार नहीं बन पाते और सरकार में बैठे लोग पुस्तक प्रेमी नहीं बन पाते! लेकिन कैलाश काटकर और पोन मरियप्पन जैसे आम नागरिक भी समाज की गिरावट रोकने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। सच कहा जाए तो ऐसे लोग ही समाज के स्तर को ऊपर उठाते हैं, अपना वोट बैंक साधने के लिए ही हमेशा फिक्रमंद रहने वाले राजनीतिक दलों से इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती।

बारह साल पहले दिल्ली के निर्भया कांड के बाद की घटनाओं ने दिखा दिया है कि कैंडल मार्च, धरना-प्रदर्शन या सरकारी संपत्तियों की तोड़फोड़ कर अपना आक्रोश व्यक्त करने जैसे कामों से ज्यादा कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। इसके बजाय समाज के आक्रोश को सकारात्मक कार्यों की ओर मोड़ने की कोशिश की जाए तो आश्चर्यजनक रूप से सुखद परिणाम आ सकते हैं।

दरअसल लड़ाई अब राम और रावण या कौरवों-पांडवों के बीच की नहीं रह गई है। दुश्मन अगर बाहर नजर आए तो उसे मारना कठिन नहीं होता लेकिन बुरे लोग भी अब पोल खुलने के पहले तक सभ्यता का नकाब ओढ़े रहते हैं। सारे लोग अच्छाई के पक्ष में होने का दावा करते हैं, फिर भी बुराई है कि बढ़ती ही जा रही है। इसलिए अगर यह कहा जाए कि चुनौती अब हर आदमी के लिए अपने भीतर बैठे रावण को खत्म करने की है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, और इसके लिए किताबों से बढ़कर मददगार और कोई हथियार नहीं हो सकता।

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