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ब्लॉगः सुशासन और सुराज की व्यवस्था के पुनरोदय का पर्व है छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक दिवस

By प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल | Updated: June 6, 2022 13:40 IST

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं जिन्हें क्षेत्ररक्षक योद्धा, हिंदुत्व केंद्रित राजव्यवस्था तथा सामान्यजन को साथ लेकर एक अपराजेय सैन्यशक्ति के निर्माता के रूप में जाना जाता है।

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6 जून 1674 को महाराष्ट्र में एक ऐसा विशिष्ट राज्यारोहण समारोह हुआ था, जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू पद-पादशाही की स्थापना की थी। इस साम्राज्य को बाद के दिनों में मराठा साम्राज्य के नाम से जाना गया। वस्तुत: एक स्वतंत्र एवं समर्थ ‘मरहठ्ठा’ राज्य की स्थापना का स्वप्न राजा शाहजी भोंसले का था। अपने पिता के इस संकल्प को भारतीय इतिहास के अद्वितीय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज ने पूरा किया। छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं जिन्हें क्षेत्ररक्षक योद्धा, हिंदुत्व केंद्रित राजव्यवस्था तथा सामान्यजन को साथ लेकर एक अपराजेय सैन्यशक्ति के निर्माता के रूप में जाना जाता है। यह वही कालखंड है जब भारत में उत्तर से दक्षिण तक सर्वत्र भारतीय राजव्यवस्था, अर्थशास्त्र से चलने वाली शासनव्यवस्था, लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा, समता, स्वतंत्रता और समानता के आधार पर चलने वाली न्याय की प्रणाली लगभग समाप्त हो गई थी। इस निराशाजनक परिस्थिति के बीच छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा भारत में राज्याभिषेक की परंपरा का अनुगमन और अभिषेक के अवसर पर धर्मरक्षक, राष्ट्ररक्षक तथा एक न्यायी राजा के रूप में शासन करने का संकल्प भारतीय इतिहास में सदैव याद रखी जानेवाली घटना है।

छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान योद्धा और रणनीतिकार के साथ-साथ सुराज और सुशासन के संस्थापक रूप में भी जाने जाते हैं। जब सुराज और सुशासन की बात होती है तो समाज के अंतिम आदमी तक रोजगार, व्यापार तथा न्याय की समानता के अवसर कैसे पहुंचे, इस ओर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने भू-राजस्व एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए। राजस्व व्यवस्था के मामले में अन्य शासकों की तुलना में उन्होंने एक आदर्श व्यवस्था बनाई। पूरी दुनिया जब लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा से अपरिचित थी, उस समय शिवाजी महाराज ने लोककल्याणकारी राज्य की एक विशिष्ट अवधारणा का निर्माण किया। इस रूप में भी 6 जून की तिथि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि शासन व्यवस्था में एक विशिष्ट प्रकार का परिवर्तन दिखाई देता है। यह परिवर्तन राजा की सर्वोच्चता को विधिक ढंग से स्थापित करते हुए भी सत्य के वितरण का सिद्धांत प्रतिपादित करता है। छत्रपति की अष्टप्रधान व्यवस्था इसका एक उदाहरण है, जिसमें धर्म में सर्वोच्चता पुरोहित राव की है तो न्यायधीश न्याय प्रक्रिया के लिए सर्वोच्च अधिकारी है, जिसमें पेशवा राजा का प्रतिनिधि है और सत्ता संचालन का केंद्र। इसमें अमात्य राज्य में राजस्व व्यवस्था की निर्मिति, विधि तथा पूर्ण शासन संचालन का प्रधान अधिकारी है। छत्रपति शिवाजी की लोक कल्याणकारी राजव्यवस्था में सम्राट भी राज्य का स्वामी नहीं बल्कि प्रधान सेवक है, इसलिए शिवाजी महाराज ने अपने गुरु की चरण पादुका सिंहासन पर रखकर सत्ता के सूत्र संचालित किए थे। 6 जून का दिन भारतीय इतिहास का वह दिन है जब हम भूत के उस महान भारत को समझकर भविष्य की राह में मजबूती से कदम बढ़ाएं।

आज जब विश्व में सर्वत्र शक्ति के आधार पर संतुलन साधने की कोशिश की जा रही है, व्यापार वितरण और विपणन का माध्यम न होकर शक्ति के केंद्रीकरण का माध्यम हो गया है, ऐसे में शिवाजी महाराज की लोक कल्याणकारी राजव्यवस्था, जिसमें समाज के अंतिम आदमी तक न्याय की पहुंच थी, की याद स्वाभाविक है। आज पूरी दुनिया के समक्ष उपस्थित कठिन प्रश्नों के हल का जो रास्ता हम भारतीयों को दिखाई देता है, वह है छत्रपति शिवाजी के द्वारा स्थापित राजव्यवस्था। वास्तव में सुशासन और सुराज की व्यवस्था के पुनरोदय का पर्व है छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक दिवस। हिंदू पद-पादशाही की स्थापना और राज सिंहासन पर एक श्रेष्ठ सम्राट के अभिषेक का दिन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, न तो 

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