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पंकज चतुर्वेदी का ब्लॉगः स्थानीय इतिहास की उपेक्षा का रवैया ठीक नहीं

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: December 30, 2021 16:08 IST

यह समझना जरूरी है कि अपनी स्थानीयता, अपने शहर, अपने पूर्वजों पर गर्व करने वाला समाज ही अपने परिवेश और सरकारी या निजी संपत्ति से जुड़ाव महसूस करता है और उसको सहेजने के प्रति संवेदनशील बनता है।

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पीलीभीत में बांसुरी महोत्सव का आयोजन हुआ, वहां आए बच्चे, नौकरीपेशा वर्ग, स्थानीय व्यापारी इस बात से बेखबर थे कि कभी सुभाषचंद्र बोस को देश से बाहर ले जाने में मदद करने वाले भगतराम तलवास बीस साल तक उनके ही शहर में रहे। उन्हें यह भी नहीं पता था कि सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनके शहर के आयुर्वेदिक कालेज का एक छात्र दामोदर शहीद हो गया था। एटा का सरकारी स्कूल 134 साल पुराना हो गया, उसने कई अफसर, नेता, अभिनेता बनाए लेकिन जैसे ही नया भवन बना, पुरानी इमारत खंडहर बनने को मजबूर हो गई। शाहजहांपुर में 1857 के महान लड़ाके मौलवी साहब की कब्र हो या बिस्मिल का मकान, गुमनामी में हैं- न प्रशासन को परवाह है और न ही स्थानीय समाज को इसकी चिंता। शायद देश के हर कस्बे-शहर की यही त्रसदी है, चौड़ी सड़क, चमचमाती बिल्डिंग के लोभ में अतीत को खंडहर में बदलते देखने में उनकी कोई संवेदना नहीं जागती। विडंबना है कि जब तक इतिहास को नए तरीके से लिखने का विचार आता है, वह सांप्रदायिक मसलों में फंस कर विवादों में घिर जाता है।

यह समझना जरूरी है कि अपनी स्थानीयता, अपने शहर, अपने पूर्वजों पर गर्व करने वाला समाज ही अपने परिवेश और सरकारी या निजी संपत्ति से जुड़ाव महसूस करता है और उसको सहेजने के प्रति संवेदनशील बनता है। यह भी समझना होगा कि अब वह पीढ़ी गिनती की रह गई है जिसने आजादी के संघर्ष को या तो देखा या उसके सहभागी रहे, सो जाहिर है कि उस काल के संघर्ष को समझना आज की पीढ़ी के लिए थोड़ा कठिन होगा। यह देश का कर्तव्य है कि आजादी की लड़ाई से जुड़े स्थान, दस्तावेज, घटनाओं को उनके मूल स्वरूप में सहेज कर रखा जाए, वरना आजादी का इतिहास वही बचेगा जो कि राजनीतिक उद्देश्य से गढ़ा जा रहा है।

इतिहास के तथ्यों पर विभिन्न लोगों का एकमत न होना स्वाभाविक है। जैसे-जैसे हमारा नजरिया बदलता है, हम अतीत को भी नए तरीके से देखते हैं - घटनाओं की पुनव्र्याख्या, उसमें निहित नए अर्थो की खोज, पूर्व के विश्लेषणों में अछूते रह गए नए प्रश्नों को उठाना। यही कारण है कि अतीत की किसी एक कहानी को इतिहासकार कई तरीकों से प्रस्तुत करते हैं। इतिहास को नए तरीके से लिखने के लिए वे तथ्यों की व्याख्या नए तरीके से करते हैं - ऐसे तरीकों से जो कि अतीत के बारे में हमारी धारणाओं को समृद्ध करते हों।

खासकर आजादी का इतिहास लिखने के लिए जरूरी है कि उसकी प्रमुख घटनाओं से जुड़ी इमारतों-स्थानों को उनके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखा जाए। आगरा या कानपुर में सरदार भगत सिंह के ठहरने के स्थान को अब तलाशा नहीं जा सकता, झांसी में आजाद सहित कई क्रांतिकारियों के स्थान का कोई अता-पता नहीं, जलियांवाला बाग में गोलियों के निशानों को दमकते म्यूरल से ढंक दिया गया। अकेले स्थान ही नहीं, दस्तावेजों के रखरखाव में भी हम गंभीर रहे नहीं। तभी इतिहास को किंवदंती या अफवाह के घालमेल से प्रस्तुत करने में कई जिम्मेदार व नामीगिरामी लोग भी संकोच नहीं करते हैं।

स्थानीय इतिहास को सहेजना व दस्तावेजीकरण करना असल में देश के इतिहास को फिर से लिखने जैसा ही है। इतिहास का पुनर्लेखन ऐतिहासिक ज्ञान की वृद्धि का स्वाभाविक प़्ाक्ष है तो हमें इस बारे में भी सतर्क रहना होगा कि तर्को के मूल में छिपी बातों की कल्पना करना या पूर्वानुमान लगाना, उठाए गए प्रश्नों, ज्ञान को प्रामाणिकता प्रदान करने की प्रक्रिया, विस्तार की गई कहानी के स्वरूप आदि किस तरह से प्रासंगिक व व्यापक इतिहास से जुड़ें।

काश! उच्चतर माध्यमिक स्तर पर बच्चों में इतिहास के प्रति अन्वेषी दृष्टि विकसित करने का कोई उपक्रम शुरू किया जाए और हर जिले के कम से कम एक विद्यालय में ऐसे दस्तावेजीकरण का संग्रहालय हो। मुफ्त ब्लॉग पर ऐसी सामग्री डिजिटल रूप से प्रस्तुत कर दी जाए तो दूरस्थ इलाकों के लोग अपने स्थानीय इतिहास को उससे संबद्ध कर अपने इतिहास-बोध को विस्तार दे सकते हैं। सबसे बड़ी बात, आजादी की लड़ाई में अपना जीवन खपा देने वाले गुमनाम लोग और उनसे जुड़े स्थान हर एक शहर को ऐतिहासिक महत्व का पर्यटन स्थल बना सकते हैं। वैसे कक्षा आठ तक जिला स्तर के भूगोल, इतिहास और साहित्य की पुस्तकें अनिवार्य करना चाहिए व उसके लिए सामग्री का संकलन स्थानीय स्तर पर ही हो। हमारा वर्तमान अपने अतीत की नींव पर ही खड़ा है और उसी पर भविष्य की इमारत बुलंद होती है। समय आ गया है कि पुरानी नींव को सुरक्षित, संरक्षित व मजबूत बनाया जाए।

टॅग्स :पीलीभीतहिस्ट्रीउत्तर प्रदेशसुभाष चंद्र बोस
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