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Indira Gandhi: इंदिरा गांधी ने शहादत से पहले देखे थे कई उतार-चढ़ाव

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: October 31, 2025 05:20 IST

Indira Gandhi: अंतिम और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी (जिन्होंने 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाकर नई राजनीति शुरू की थी) ने तो उनके शपथ ग्रहण के बाद ही यह टिप्पणी करके चौंका दिया था कि ‘अब हमें हर सुबह अखबारों के पहले पन्ने पर एक खूबसूरत महिला की तस्वीर देखने को मिलेगी.’ लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी.

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ठळक मुद्देअशोभन व व्यक्तिगत हमले झेलने पड़े. कई में उनके महिला होने को भी निशाने पर लिया गया.‘गूंगी गुड़िया’ करार दिया तो जल्दी ही विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने उसकी रट लगानी शुरू कर दी. काम के वक्त वे खुद को महिला समझती ही नहीं हैं. हां, वक्त के साथ कई सदाशयी टिप्पणियां भी उनके हिस्से आई थीं.

Indira Gandhi: 1984 में वह आज का ही दिन था, 31 अक्तूबर, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दो अंगरक्षकों ने उनके निवास पर ही गोलियों से भूनकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी. प्रसंगवश, श्रीमती गांधी अपने, इससे पहले के, प्रधानमंत्री काल में कई उतार-चढ़ाव देख चुकी थीं. 1966 में लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद वे पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें विपक्षी दलों व नेताओं के अनेक अशोभन व व्यक्तिगत हमले झेलने पड़े. इनमें कई में उनके महिला होने को भी निशाने पर लिया गया.

पहले, अंतिम और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी (जिन्होंने 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाकर नई राजनीति शुरू की थी) ने तो उनके शपथ ग्रहण के बाद ही यह टिप्पणी करके चौंका दिया था कि ‘अब हमें हर सुबह अखबारों के पहले पन्ने पर एक खूबसूरत महिला की तस्वीर देखने को मिलेगी.’ लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी.

समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया ने उनको ‘गूंगी गुड़िया’ करार दिया तो जल्दी ही विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने उसकी रट लगानी शुरू कर दी. लेकिन इंदिरा गांधी का राजनीतिक कौशल कुछ ऐसा था कि ऐसी टिप्पणियां उन पर चस्पा ही नहीं हो पाती थीं. एक साक्षात्कार में उन्होंने यह कहकर उन्हें खारिज कर दिया था कि उनको महिला होने के कारण अपने पद के दायित्व निभाने में असुविधा के बजाय बहुत सुविधा होती है. यों, काम के वक्त वे खुद को महिला समझती ही नहीं हैं. हां, वक्त के साथ कई सदाशयी टिप्पणियां भी उनके हिस्से आई थीं.

1971 में पाकिस्तान से युद्ध की तैयारियों के दौर में तत्कालीन सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने उनके बालों की सुंदरता की तारीफ करते हुए उन्हें ‘स्वीटी’ कहा था, जबकि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में उनके अध्ययनकाल में उनको प्रियदर्शिनी नाम दिया था.

1977 के लोकसभा चुनाव में उनकी ‘तानाशाही’ से नाराज मतदाताओं ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया तो उनके विरोधियों को गलतफहमी हो गई थी कि देश ने उन्हें हमेशा के लिए कूड़े के ढेर पर बैठा दिया है. लेकिन उन्होंने ढाई साल में ही उन्हें गलत सिद्ध करके सत्ता में वापसी कर ली थी.

बिहार की राजधानी पटना के बेलछी  गांव में 14 दलितों की नृशंस हत्या के पीड़ितों के आंसू पोंछने के लिए उनके द्वारा प्रदर्शित अद्भुत साहस और उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ लोकसभा सीट के उपचुनाव में जीत के लिए अपनाई गई रणनीति ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी. हुआ यूं कि मोरारजी सरकार के कुछ ही महीने बीते थे कि बाढ़पीड़ित बेलछी गांव में एक प्रभुत्वशाली पिछड़ी जाति के लोगों ने 14 दलितों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी. तब इंदिरा गांधी ने पीड़ित दलितों को ढाढ़स बंधाने के लिए उन तक पहुंचने में अपनी जान तक जोखिम में डाल दी.

13 अगस्त, 1977 को वे दिल्ली से विमान से पटना पहुंचीं और शुभचिंतकों के आगाह करने के बावजूद कि उनका बेलछी जाना खतरे से खाली नहीं है, वहां गईं. बेहद खराब सड़क ने उनकी कार का रास्ता रोक दिया तो एक ट्रैक्टर पर जा बैठीं. लेकिन वह भी उन्हें रास्ते में पड़ने वाली नदी पार नहीं करा सका.

इस पर उन्होंने एक बिना हौदे वाले हाथी की नंगी पीठ पर बैठकर नदी पार की और कमर तक पानी से गुजरकर बेलछी पहुंचीं. कहते हैं कि श्रीमती गांधी वहां पीड़ित दलितों से मिलीं तो वे विह्वल हो उठे. उन्हें कमर तक भीगी साड़ी पहने देख उनके लिए दूसरी साड़ी मंगवाई और भावुक होकर कहा कि ‘आपको वोट न देकर हमने बड़ी गलती की.’ फिर तो अखबारों में इसकी व्यापक चर्चा हुई, जो राजनीतिक परिवर्तन का टर्निंग प्वाइंट बन गई.  

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