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फिरदौस मिर्जा का ब्लॉगः नस्लवाद से भारतीय समाज भी अछूता नहीं

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: October 16, 2020 14:46 IST

भारत में जातिवाद के बदसूरत चेहरे का एक अन्य आधार धर्म है. हमने अलग-अलग धर्मो के लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना शुरू कर दिया है. हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम के एक पूर्व सदस्य ने बताया है कि किसी विशेष धर्म के सदस्यों को कुछ इलाकों में घर लेने की अनुमति नहीं थी.

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‘‘यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह भारत के सभी लोगों के बीच धार्मिक, भाषाई और क्षेत्नीय विविधताओं के बीच सामंजस्य और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दे; महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अपमानजनक व्यवहार का त्याग करे.’’ (अनुच्छेद 51-ए (ई)) हाथरस (यूपी) की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने राष्ट्र को पहले कठुआ, उन्नाव, खैरलांजी में हुए महिलाओं के खिलाफ इसी तरह के अत्याचारों और सामाजिक विभाजन की याद दिला दी है जिसमें धार्मिक या जातिगत आधार पर समाज के अलग-अलग वर्गो ने आरोपी और पीड़ितों का समर्थन किया था. 

जॉर्ज फ्लॉयड की मौत ने दुनिया और कई संभ्रांत भारतीयों को हिला दिया, जिन्होंने अपने गुस्से और सहानुभूति का इजहार किया है. कई भारतीयों ने पश्चिमी दुनिया में त्वचा के रंग के आधार पर नस्लवाद की प्रथा की निंदा की. एक तरफ तो हमने संयुक्त राज्य अमेरिका में नस्लवादी अधिनियम के खिलाफ प्रतिक्रि या व्यक्त की, वहीं अपने ही देश में नस्लवाद के शिकार लोगों के पक्ष में अपनी आवाज उठाने में हम विफल रहे. राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 2019 में प्रतिदिन अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार के 126 और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ 26 मामले दर्ज किए गए(अपंजीकृत मामलों की संख्या ज्ञात नहीं है).

यह एक तथ्य है कि दुनिया भर में किसी न किसी तरीके से नस्लवादी व्यवहार किया जाता है और भारत इसका अपवाद नहीं है भारत में मनुष्यों के बीच नस्लवाद या भेदभाव प्राचीन काल से ही रहा है, जिसे आमतौर पर जाति के रूप में जाना जाता है. तथाकथित नीची जाति के मानव अधिकारों को मान्यता नहीं दी गई थी और उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था. निम्न जाति के लोगों द्वारा पाले गए मवेशियों को सार्वजनिक स्रोत से पानी पीने की अनुमति थी लेकिन मवेशियों के मालिक को उस पानी को छूने की अनुमति नहीं थी. इसके परिणामस्वरूप 1927 में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने सामाजिक क्रांति की, जिसे महाड आंदोलन के रूप में जाना जाता है.

भारत में अस्पृश्यता की जो प्रथा थी, उससे भी बुरे स्वरूप में नस्लवाद था. इस तथ्य को संविधान सभा द्वारा देखा गया और अनुच्छेद-17 को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया जिसमें ‘अस्पृश्यता’ को समाप्त कर दिया गया था और किसी भी रूप में इसके अभ्यास को निषिद्ध कर दिया गया.

संविधान सभा में अनुच्छेद 17 पर चर्चा के दौरान, माननीय सदस्य श्रीमती दाक्षायणी वेलायुधन ने कहा था, ‘‘संविधान का क्रियान्वयन इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग भविष्य में कैसा आचरण करेंगे, न कि कानून के वास्तविक निष्पादन पर. इसलिए, मुङो आशा है कि समय के साथ इस तरह का कोई समुदाय नहीं रह जाएगा, जिसे अछूत के रूप में माना जाए और तब विदेशों में किसी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के संगठन के बारे में सवाल उठाए जाने पर हमारे प्रतिनिधियों को सिर शर्म से नहीं झुकाना होगा.’’ ऐसा लगता है, हम भारतीय संविधान सभा की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके, इसलिए संसद ने अस्पृश्यता की प्रथा को दंडित करने के लिए ‘नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1955’ बनाया. 

संविधान के निर्माताओं ने हम भारतीयों से अपेक्षा की थी कि हम अस्पृश्यता की प्रथा को समाप्त कर देंगे और संविधान की प्रस्तावना में वर्णित न्याय, स्वतंत्नता, समानता और बंधुत्व के संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करेंगे. दुर्भाग्य से हम ऐसा करने में असफल रहे और 1955 का अधिनियम हम भारतीयों की संवैधानिक नैतिकता को नहीं जगा सका. इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ जातिगत अत्याचार के मामलों में वृद्धि को देखते हुए, एक और अधिक कठोर कानून, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में अधिनियमित किया गया. इसमें सजा की अवधि बढ़ा दी गई, अत्याचारों की प्रकृति की परिभाषा को व्यापक किया गया और कानून के प्रवर्तन में कर्तव्य की उपेक्षा करने पर लोक सेवकों के लिए सजा निर्धारित की गई थी.

 उपरोक्त दो अधिनियमों के बावजूद, मैला सिर पर ले जाने या उसे छूने के लिए किसी व्यक्ति को मजबूर करने अर्थात मैला ढोने की प्रथा चली आ रही थी. मैनुअल स्केवेंजर्स निषेध और पुनर्वास अधिनियम, 2013 के जरिये इस तरह के कार्य को अपराध बना दिया गया और यहां तक कि लोक सेवकों को भी, यदि वे किसी व्यक्ति को हाथ से मैला ढोने के लिए नियोजित करते हैं तो उनको सजा के लिए उत्तरदायी बनाया गया.1950 से अब तक अस्पृश्यता के उन्मूलन के एक ही विषय पर समय-समय पर विभिन्न कानून बनाए जाने से पता चलता है कि हम जन्म के आधार पर मनुष्यों के बीच भेदभाव करने की प्रथा को समाप्त नहीं कर सके हैं और भारत में जातिवाद अभी भी प्रचलित है. 

भारत में जातिवाद के बदसूरत चेहरे का एक अन्य आधार धर्म है. हमने अलग-अलग धर्मो के लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना शुरू कर दिया है. हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम के एक पूर्व सदस्य ने बताया है कि किसी विशेष धर्म के सदस्यों को कुछ इलाकों में घर लेने की अनुमति नहीं थी. कुछ दिन पहले, मीडिया के कुछ हिस्सों में बताया गया था कि विशेष धर्म के छात्नों के बैठने के लिए एक अलग स्थान निर्धारित किया गया था. 

धार्मिक पहचान के कारण मॉब लिंचिंग का शिकार होने वालों की लंबी सूची संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना पर धब्बा है. दिल्ली में छात्नों के खिलाफ हाल की कार्रवाई भी बहुत कुछ कहती है. हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि नस्लवाद अब प्रशासन में कानून प्रवर्तन करने वालों में भी प्रवेश कर गया है. दुर्भाग्य से हमारे पास धर्म आधारित नस्लवाद से निपटने के लिए विशेष कानून नहीं है.

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