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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: भारतीय संस्कृति का प्रवेश-द्वार है संस्कृत

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: March 5, 2020 07:57 IST

तर्क, प्रमाण और अनुभव  की कसौटियों पर खरे उतरने वाले व्याकरण, न्याय, आयुर्वेद, योग, नाट्यशास्त्र और ज्योतिष आदि के अन्यान्य ज्ञान क्षेत्रों में उपलब्ध सामग्री मनुष्य मात्र की विरासत है जिसका संरक्षण और संवर्धन वरीयता के साथ होना चाहिए. भारतीय संस्कृति और सभ्यता के परिसर में प्रवेश के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है.

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वर्तमान समय में संस्कृत भाषा और साहित्य को लेकर प्राय: उदासीनता और उपेक्षा का भाव ही प्रबल रहता है. उसे बीता बिसरा कल मानते हुए, समकालीन जीवन के लिए अप्रासंगिक समझते हुए दूरी बनाए रख बर्ताव किया जाता है.

अलंकरण के रूप में जरूर ध्येय वाक्य ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्यौगिकी और शिक्षण प्रशिक्षण के केंद्रों एवं प्रशासनिक, व्यावसायिक तथा सामरिक प्रतिष्ठानों आदि में चुन कर चिपका दिया जाता है. परंतु आचरण तो छोड़ दें इनके अर्थ और उनसे जुड़ी भावनाओं की ओर भी लोगों का ध्यान कम ही जा पाता है.

कमोबेश यही स्थिति तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ में भी दिखती है. यह स्थिति भी अंशत: संस्कृत की अज्ञानता के कारण ही है. आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की प्रगति की छाया में मनुष्य की प्रगति और कल्याण पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. ऐसे में विचारणीय है कि इस तरह की दुरावस्था हमें किधर ले जा रही है और हम क्या खो रहे हैं, क्या पा रहे हैं. यह मंथन इसलिए भी किया जाना चाहिए कि देश नई शिक्षा नीति अपनाने के लिए तैयार हो रहा है.

संस्कृत को लेकर अनेक भ्रम पाले गए हैं जो उसे व्यर्थ साबित करने के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं. भाषा की दुरूहता या कठिनाई, धार्मिकता, अवैज्ञानिकता और जीवन के लिए अनुपयोगिता तक के आक्षेप लगाए जाते रहे हैं. परंतु यह सब सतही तौर पर प्रचलित पूर्वाग्रह ही अधिक हैं.

वेदों, वेदांगों, उपनिषदों, दर्शनों, स्मृतियों,  पुराणों, अर्थशास्त्र, कामसूत्र, महाभारत, रामायण और सर्जनात्मक साहित्य के विपुल भंडार को यूं ही कपोल कल्पना मान कर खारिज कर देना भारतीय सभ्यता के साथ घोर अन्याय होगा.

तर्क, प्रमाण और अनुभव  की कसौटियों पर खरे उतरने वाले व्याकरण, न्याय, आयुर्वेद, योग, नाट्यशास्त्र और ज्योतिष आदि के अन्यान्य ज्ञान क्षेत्रों में उपलब्ध सामग्री मनुष्य मात्र की विरासत है जिसका संरक्षण और संवर्धन वरीयता के साथ होना चाहिए. भारतीय संस्कृति और सभ्यता के परिसर में प्रवेश के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है.

आज के जीवन की अनेक विसंगतियों और मूल्यों की चिंता के समाधान के लिए भी यह उपयोगी होगा.

दुर्भाग्यवश औपनिवेशिक मानसिकता ने हमारे सांस्कृतिक विवेक को बड़ी ठेस पहुंचाई है और हम अभी तक उबर नहीं सके हैं. साथ ही पश्चिमी आधुनिकता के संक्रामक प्रभा-मंडल के आकर्षण के अधीन होकर हमारी मौलिकता नष्टप्राय सी हो रही है. भारतीय विश्वदृष्टि या पैराडाइम की संभावना विरल हो रही है. आज जब वैश्वीकरण हावी हो रहा है तो ज्ञान के क्षेत्र में हमारी भागीदारी भी होनी चाहिए.

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