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जाली नोटों ने देश में बढ़ाई समस्या, इससे निपटने के क्या हैं उपाय?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: December 10, 2022 15:48 IST

देश की खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा नकली नोटों के प्रसार को रोकने की भरसक कोशिश की जाती है, सरकार द्वारा नागरिकों को इस संबंध में जागरूक भी किया जाता है लेकिन नकली नोटों के प्रसार के आंकड़े बताते हैं कि इन प्रयत्नों का वांछित असर नहीं हो रहा है।

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करीब छह साल पहले जब पांच सौ और एक हजार रु. के नोटों की नोटबंदी की गई थी तो उसके पीछे एक बड़ा उद्देश्य जाली नोटों पर अंकुश लगाना था। लेकिन जिस तरह से नकली नोटों के जब्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे लगता नहीं है कि नकली नोटों पर अंकुश लगा है। ताजा घटना में नागपुर में पुलिस ने अकोला के एक व्यक्ति को पांच सौ रु. का नकली नोट चलाते हुए रंगेहाथ पकड़ कर उसके पास से 2.22 लाख रु. के नकली नोट जब्त किए। हालांकि इसके पीछे कितना बड़ा गिरोह है, इसकी जड़ें कहां तक फैली हुई हैं और असली सूत्रधार कौन है यह सब तो जांच से ही पता चलेगा लेकिन नकली नोट चलाने वालों का जाल पूरे देश में फैला हुआ है। 

रिजर्व बैंक की वित्तीय वर्ष 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई ने वर्ष 2020-21 की तुलना में 500 रुपए मूल्य के 101.9 प्रतिशत अधिक नकली नोट और 2000 रुपए मूल्य के 54.16 प्रतिशत अधिक नकली नोटों का पता लगाया। इसका मतलब है कि साल भर में पांच सौ रु. के नकली नोट दोगुना बढ़ गए! ध्यान देने की बात यह भी है कि रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में जिन नकली नोटों की बात की गई है  वे केवल बैंकों में पकड़े गए हैं और इसमें पुलिस तथा अन्य प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा जब्त किए गए जाली नोटों का आंकड़ा शामिल नहीं है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 के दौरान 92 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के कुल 8,34,947 नकली नोट जब्त किए गए। वर्ष 2019 में पकड़े गए 25 करोड़ रुपए मूल्य के 2,87,404 नकली नोटों की तुलना में ये 190.5 प्रतिशत ज्यादा थे। जाहिर है कि नकली नोटों का प्रसार साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा इसे रोकने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। 

नोटों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए उनमें वॉटर-मार्क, सिक्योरिटी थ्रेड या सुरक्षा धागा, गुप्त छवि, माइक्रोलेटरिंग, सील और पहचान चिन्ह जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन जैसे-जैसे सुरक्षा बढ़ने के लिए नोटों में नए फीचर्स शामिल किए जाते हैं, वैसे-वैसे उनकी नकल करने की तकनीक भी विकसित होती जाती है। मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब दुश्मन देशों की सरकारें भी इसमें शामिल हों। हालांकि देश की खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा नकली नोटों के प्रसार को रोकने की भरसक कोशिश की जाती है, सरकार द्वारा नागरिकों को इस संबंध में जागरूक भी किया जाता है लेकिन नकली नोटों के प्रसार के आंकड़े बताते हैं कि इन प्रयत्नों का वांछित असर नहीं हो रहा है। नकली नोटों के प्रसार पर पूरी तरह से रोक लगा पाना लगभग असंभव जैसा ही काम है लेकिन अधिकतम सतर्कता बरत कर इस पर काफी हद तक अंकुश अवश्य लगाया जा सकता है। इसके अलावा नोटों पर निर्भरता कम करने के लिए डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना भी एक उपाय है। यह संतोष का विषय है कि सरकार इस दिशा में ध्यान दे रही है और हाल ही में आरबीआई द्वारा डिजिटल रुपए के खुदरा इस्तेमाल का पायलट प्रोजेक्ट शुरू जाना इस दिशा में एक बड़ा कदम है। इसे बढ़ावा देकर बड़े मूल्यवर्ग के नोटों का चलन अगर बंद कर दिया जाए तो  जाली नोटों की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। वैसे भी डॉलर, पाउंड जैसी वैश्विक मुद्राओं के सौ से अधिक मूल्यवर्ग के नोट नहीं छापे जाते हैं। दुनिया के अनुभव से हमें भी सीख लेनी चाहिए। 

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