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ब्लॉग: छात्रों को सृजनात्मक बनाने पर होना चाहिए शिक्षा का जोर, नई नीति से कुछ उम्मीदें जरूर हैं

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: April 13, 2023 14:51 IST

संभवतः पहली बार सृजनात्मकता को शिक्षा नीति का केंद्रीय विषय बनाया गया है. प्रतिभा किस प्रकार फले-फूले, इस विषय में यह शिक्षा नीति सोच रही है.

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औपचारिक शिक्षा और सृजनात्मकता के आपसी संबंध समाज के वर्तमान और भविष्य के निर्माण के साथ गहनता से जुड़े हुए हैं. शिक्षा में सृजनात्मकता कितनी बची रहेगी और कितनी समाहित होगी इस बात पर देश का ही नहीं बल्कि सारी मनुष्यता का भविष्य निर्भर करता है. शिक्षा सृजनात्मकता के साथ शब्द और अर्थ की ही तरह आपस में जुड़ी हुई है. जैसे शब्द और अर्थ एक दूसरे से संपृक्त होते हैं, एक के बिना दूसरे का कोई मूल्य या उपयोगिता नहीं होती, ठीक वैसे ही शिक्षा और सृजनात्मकता भी एक दूसरे से जुड़े और अन्योन्याश्रित होते हैं. 

बगैर सृजनात्मकता के शिक्षा अर्थहीन होगी और किसी भी तरह की सृजनात्मकता के विकास के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण जरूरी होता है. इसलिए शिक्षा की सार्थकता के लिए उसका रचनात्मक और सृजनात्मकता होना ही चाहिए. किंतु जब हम शिक्षा-व्यवस्था में सृजनात्मकता की जगह तलाशते हैं तो विफलता ही हाथ लगती है. रटना और उसे परीक्षा में पुनरुत्पादित कर देना ही शिक्षा का लक्ष्य बन चुका है.

शिक्षा और सृजनात्मकता के बीच की कड़ी सामान्य शिक्षा केंद्रों में बहुत क्षीण अथवा कमजोर होती जा रही है. हम जो शिक्षा व्यवस्था देख रहे हैं, जिसमें जी रहे हैं उसमें ज्यादातर जगहों पर सृजनात्मकता का कोई अंश ढूंढ़े नहीं मिल रहा है. यह अलग बात है और जिस पर गौर किया जाना चाहिए कि भारत और अन्यत्र भी रचनाशील लोगों को औपचारिक शिक्षा अक्सर रास नहीं आती है.  ऐसे लोगों ने बीच में ही पढ़ना छोड़ दिया जिनके भीतर तीव्र रचनात्मकता थी. उनको स्कूली व्यवस्था रास नहीं आई. 

ऐसा इसलिए था क्योंकि औपचारिक शिक्षा व्यवस्था एक औपनिवेशिक दृष्टि की उपज थी. इस तथ्य से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इस शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य अंग्रेजी राज के लिए बाबू यानी क्लर्क तैयार करना था. इसलिए सबसे पहले आत्मबोध को खंडित किया गया और धीरे-धीरे उसे विस्मृति के अंधे कुएं में डाल दिया गया, जिसका परिणाम है कि किसी चीज अथवा प्रत्यय का भारतीय होना हीन माना जाने लगा. यहां तक कि जब तक विदेश की मुहर न लग जाए तब तक उसे स्वीकार न करने का ही चलन बन गया.

नई शिक्षा नीति से कुछ आशा अवश्य बंधी है. इसका कारण यह है कि संभवतः पहली बार सृजनात्मकता को शिक्षा नीति का केंद्रीय विषय बनाया गया है. प्रतिभा का प्रस्फुटन किस प्रकार हो, इस विषय में यह शिक्षा नीति सोच रही है. उसके विविध अवसर किस प्रकार सृजित हों, इस दिशा में कदम बढ़ते दिख रहे हैं. हमको यह करना ही होगा. शिक्षा-व्यवस्था को आमूलचूल बदलकर उसके द्वारा नए ढंग से सोचने की, जिज्ञासा की, प्रयोग की भूमि तैयार करनी होगी.

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