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ब्लॉग: कर्नाटक में कांग्रेस की जीत ने विपक्षी एकता को दी नई 'ताकत', भ्रम में डूबे क्षेत्रीय और प्रादेशिक दलों के लिए भी सोचने का नया अवसर

By राजेश बादल | Updated: May 23, 2023 12:16 IST

कर्नाटक में निर्वाचन से पहले गैरभाजपा और गैरकांग्रेस वाले गठबंधन की तरफ कुछ दलों ने कदम बढ़ाए थे. तीसरे मोर्चे की बात हो रही थी, हालांकि अब बदले राजनीतिक परिदृश्य में यह साफ होता नजर आ रहा है कि देश की सर्वाधिक बुजुर्ग पार्टी के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है.

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सियासी मंच पर कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कुछ नए समीकरणों का संकेत दिया है. चुनाव से पहले क्षेत्रीय और प्रादेशिक दल कुछ ठिठके से और भ्रम में डूबे दिखाई दे रहे थे. लेकिन कांग्रेस की जीत ने उन्हें नए सिरे से सोचने का अवसर दिया है. कर्नाटक में निर्वाचन से पहले गैरभाजपा और गैरकांग्रेस वाले गठबंधन की तरफ इन दलों ने कुछ कदम बढ़ाए थे. तीसरे मोर्चे की ओर वे दो कदम आगे और एक कदम पीछे वाले अंदाज में चल रहे थे. पर बदले राजनीतिक परिदृश्य में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते नजर आ रहे हैं कि देश की सर्वाधिक बुजुर्ग पार्टी के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है. 

अलबत्ता अपने प्रादेशिक हितों के चलते ऐसे गठबंधन से दूर रहना कुछ पार्टियों की विवशता भी है. दूसरी ओर कांग्रेस के नजरिये से बीता पखवाड़ा इसलिए भी लाभदायक रहा है कि क्षेत्रीय पार्टियां अब यूपीए के अस्तित्व को चुनौती नहीं दे सकेंगी. आपको याद होगा कि बीते दिनों राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार की उपस्थिति में तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा था कि यूपीए का कोई अस्तित्व ही नहीं है और न ही कांग्रेस उसकी अगुआई कर रही है. 

हालांकि सियासी गलियारों में उनके इस कथन को अधिक महत्व नहीं दिया गया क्योंकि एक-डेढ़ करोड़ मतदाताओं के वोट बैंक वाली पार्टी बारह-तेरह करोड़ मतदाताओं का जनाधार रखने वाली पार्टी के अस्तित्व को नकारे- यह मासूमियत भरा ख्याल ही है.

वैसे तो करीब-करीब हर आम चुनाव से पहले विपक्षी एकता और तीसरे मोर्चे की कवायद होने लगती है. कई दशकों से हम यह अनुभव देख रहे हैं. मगर वह शायद ही कभी परवान चढ़ी हो. अपवाद के तौर पर 1977 का आम चुनाव याद कर सकते हैं. लेकिन उस दौर की परिस्थितियां तथा राजनीतिक समीकरण एकदम अलग थे. कांग्रेस को पराजित करने के मकसद से जो गठबंधन जनता पार्टी की शक्ल में सामने आया, वह तीन साल के भीतर ही बिखर गया. 

इसके बाद 1989 में भी कुछ पार्टियों के गठजोड़ हुए थे, पर वे नाकाम रहे. वे सिर्फ कांग्रेस को हराने के लिए बने थे और उनका कोई वैचारिक आधार नहीं था. क्या ही दिलचस्प नजारा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की जनता दल सरकार को भारतीय जनता पार्टी समर्थन दे रही थी और वाम दल भी साथ में थे इसलिए उस सरकार का अंजाम भी विनाशकारी रहा और 1991 के चुनाव में गठबंधन बिखरा हुआ था. बाकी कुछ अवसरों पर छोटे दलों ने बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों से समझौते किए, मगर उनका आधार वैचारिक नहीं था. उसके पीछे छोटी पार्टियों के अपने स्वार्थ थे. 

अलबत्ता 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के कौशल की वजह से एनडीए ने पूरे पांच साल सरकार चलाई और उनके बाद दस बरस तक डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार रही. इसके बाद की राजनीति में क्षत्रपों ने गठबंधनों से एक दूरी बनाकर रखी है. एनडीए से जेडीयू, अकाली दल और शिवसेना जैसे साथी छिटक गए और यूपीए के भी कुछ सहयोगी दुविधा में हैं.

यह भी देखा गया है कि विपक्षी गठबंधन के लिए जो दल शुरुआत में साथ आते हैं, वे आपसी मतभेद और हितों के टकराव के कारण बाद में दम तोड़ देते हैं. वजह यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर जो दल विपक्ष की एकता के लिए प्रयास करते दिखाई देते हैं, प्रादेशिक स्तर पर वे स्थानीय समीकरणों के कारण टूट जाते हैं. एक-दो उदाहरण ही प्रासंगिक होंगे. यदि तृणमूल कांग्रेस भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हो जाए तो वह बंगाल में वाम दलों से कैसे तालमेल करेगी? वह तो वाम मोर्चे को शिकस्त देकर ही सत्ता में आई थी. 

कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन में वाम दल भी साथ रहेंगे ही. इसी तरह आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस कैसे सहज महसूस कर सकती है, जिसने उसके दिल्ली और पंजाब के मजबूत किलों को ध्वस्त किया हो. यह विचित्र सी बात होगी कि कोई पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को हराने के लिए तो कांग्रेस के साथ आ जाए, लेकिन प्रदेश स्तर पर वह उसी कांग्रेस के खिलाफ लड़े. वह अपना जनाधार घटाकर कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल क्यों करना चाहेगी या इसे यूं भी कह सकते हैं कि कांग्रेस पंजाब और दिल्ली में अपना खोया जनाधार पाने का प्रयास दोबारा क्यों न करे?

राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच पर अपनी भूमिका निभाने के लिए बेताब क्षेत्रीय पार्टियों को मंजूर कर लेना चाहिए कि उन्हें अपना वैचारिक और लोकतांत्रिक आधार और मजबूत करना होगा. यह इसलिए कि अखिल भारतीय स्तर पर राजनीति वैचारिक धरातल पर दो ठोस ध्रुवों में बंट चुकी है. लोकतांत्रिक सेहत के लिए एक तरह से यह बेहतर स्थिति कही जा सकती है. चाहकर भी प्रादेशिक दल अपने संगठन को घर की दुकान की तरह नहीं चला सकते. उन्हें अपनी विचारधारा का खुलकर ऐलान करना होगा, संगठन के भीतर चुनाव कराने होंगे और राष्ट्रहित में ही गठबंधन का चुनाव करना होगा. वे या तो भाजपा के एनडीए के साथ जाएं अथवा कांग्रेस की अगुआई में यूपीए का दामन थामें. 

फिलहाल तो भारतीय राजनीति में किसी अन्य तीसरे धड़े की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती, जो दोनों बड़ी पार्टियों के बराबर खड़ा होकर उन्हें चुनौती दे सके. न ही समाजवादी दल इतने ताकतवर हैं और न कोई अन्य वैचारिक धारा. वैसे प्रादेशिक पार्टियों को एक बात पर ध्यान देना होगा. आज का मतदाता पंद्रह-बीस साल पुराना मतदाता नहीं है. वह अब अधिक परिपक्व और समझदार है. आधुनिक संचार-संवाद के माध्यमों ने गांव-गांव में उसे बेहद जागरूक बना दिया है. क्षेत्रीय दलों की स्थानीय राजनीति के दांव-पेंच वह समझने लगा है इसलिए छोटे दलों की भलाई इसी में है कि वे विचार और सरोकार आधारित गठबंधन करें.

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