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राजेश शर्मा का ब्लॉग: जन्मजात हृदय विकार वाले बच्चों की न हो उपेक्षा

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: February 12, 2022 10:56 IST

अगर समय पर इलाज किया जाए तो अधिकांश सीएचडी का इलाज संभव है। जन्मजात हृदय विकार की स्थिति वाले शिशुओं और बच्चों के लिए समय पर इलाज और सर्जरी होना महत्वपूर्ण है। देरी से उपचार होने में उसके असफल होने का खतरा रहता है और साथ ही यह सर्जरी के बाद की जटिलताओं का कारण बन सकता है।

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ठळक मुद्दे1990 के बाद से, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र ने भारत में प्रभावित बच्चों के सफल हृदय उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।निजी अस्पतालों में आने वाले सभी बच्चों में से लगभग 80 प्रतिशत परिवारों को खुद ही खर्च वहन करना होता है।

दुनिया फरवरी को जन्मजात हृदय विकार (सीएचडी) जागरूकता माह के रूप में मान्यता देती है और 7 से 14 फरवरी अंतरराष्ट्रीय सीएचडी सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश में सीएचडी के साथ पैदा हुए बच्चों के इलाज की स्थिति की पड़ताल करना समीचीन होगा। जन्मजात हृदय विकार की घटना प्रति 100 बच्चों में केवल एक है और इनमें से 20 प्रतिशत को तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है। हमारी जन्म दर को देखते हुए (सीएचडी वाले 240000 बच्चे हर साल पैदा होते हैं) आज, अनुभवी पीडियाट्रिक कार्डिएक सर्जरी इकाइयों में सीएचडी का इलाज 95 प्रतिशत से अधिक सफलता दर के साथ किया जा सकता है। 

अगर समय पर इलाज किया जाए तो अधिकांश सीएचडी का इलाज संभव है। जन्मजात हृदय विकार की स्थिति वाले शिशुओं और बच्चों के लिए समय पर इलाज और सर्जरी होना महत्वपूर्ण है। देरी से उपचार होने में उसके असफल होने का खतरा रहता है और साथ ही यह सर्जरी के बाद की जटिलताओं का कारण बन सकता है। ऐसे में बच्चा बड़ा होने पर भी शारीरिक अक्षमता का शिकार बना रह सकता है। बचपन में सही समय पर सर्जरी के एक सरल कदम के साथ सामान्य जीवन संभव है। अपनी ओर से, सरकार ने सीएचडी के उपचार में मदद के लिए कई कदम उठाए हैं। 

उसने विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं जो या तो वित्तीय सहायता या मुफ्त इलाज की भी पेशकश करती हैं। लेकिन इनमें से अधिकतर योजनाएं सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में ही लागू होती हैं जबकि वास्तविकता यह है कि पूरे देश में कुछ ही सरकारी अस्पताल हैं जो अच्छा इलाज करते हैं और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली (एम्स) जैसे केंद्रों में लंबी प्रतीक्षा सूची है। आयुष्मान या राष्ट्रीय बाल सेवा कार्यक्रम (आरबीएसके) जैसी योजनाएं निजी अस्पतालों के लिए खुली हैं, लेकिन निजी अस्पताल का शुल्क इन योजनाओं से मिलने वाले भुगतान के मुकाबले कम से कम दोगुना होता है।

1990 के बाद से, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र ने भारत में प्रभावित बच्चों के सफल हृदय उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि एक निजी अस्पताल में रोगी को सरकारी अस्पतालों की तुलना में कम से कम दो से तीन गुना अधिक खर्च लगता है क्योंकि वहां कर्मचारियों के वेतन जैसे मदों और अस्पताल के सभी परिचालन व्यय को रोगी के बिलों के माध्यम से पूरा किया जाता है। लेकिन आर्थिक तंगी के बावजूद, गरीब लोग भी अपने प्रियजनों का निजी अस्पतालों में इलाज कराने की इच्छा रखते हैं, क्योंकि सुविधाएं अधिक होती हैं, डॉक्टर सक्षम होते हैं और इलाज शुरू करने में समय की बर्बादी नहीं होती है। 

वर्तमान स्थिति में, निजी अस्पतालों में आने वाले सभी बच्चों में से लगभग 80 प्रतिशत परिवारों को खुद ही खर्च वहन करना होता है। इस स्थिति में, किसी जटिलता या अभूतपूर्व स्थिति के इलाज के लिए यदि किसी निजी अस्पताल में ऑपरेशन करने वाले बच्चे को उसके बजट से अधिक समय तक रहने की आवश्यकता होती है, तो खर्च को देखते हुए वास्तव में वह सड़क पर आ सकता है। कई परिवार निजी अस्पतालों में इलाज के चलते गरीबी रेखा के नीचे आ जाते हैं।

भारत चिकित्सा पर्यटन के केंद्र के रूप में उभर रहा है और निजी अस्पतालों में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों को पाने की होड़ है। हमारे डॉक्टरों और नर्सो की विशेषज्ञता को देखते हुए, उपचार की लागत को पश्चिमी और साथ ही सुदूर पूर्वी (थाईलैंड, सिंगापुर) देशों में समान इलाज के शुल्क की तुलना में बहुत कम माना जाता है। विडंबना यह है कि कई भारतीय माता-पिता के लिए यह अस्पताल पहुंच से दूर रहते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में चिकित्सा बीमा एक बड़ा मुद्दा है। भारत में बिना किसी अपवाद के, सभी जन्मजात विकार चिकित्सा बीमा के दायरे से बाहर होते हैं। अमीर लोग कितना भी खर्च कर सकते हैं, गरीबों के पास बीपीएल योजनाएं हैं, लेकिन कर चुकाने वाले मध्यम वर्ग को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। क्या कर देने वाला वेतनभोगी मध्यम वर्ग अपने बच्चों के लिए भी कवर पाने का हकदार नहीं है?

कर्नाटक राज्य में किसान बीमा (यशस्विनी) की सफलता ने दिखाया है कि सरकार मदद के लिए हाथ बढ़ाए तो गरीब से गरीब व्यक्ति भी लाभान्वित हो सकता है। यहां हर किसान परिवार हर महीने 5 रुपए का भुगतान करता है और सरकार भी उतनी ही राशि का योगदान करती है। इसी तरह यदि प्रत्येक गर्भावस्था पर प्रीमियम का एक समान भुगतान सुनिश्चित किया जाए तो जन्मजात हृदय विकारों की कम घटनाओं को देखते हुए बीमा कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा और जरूरतमंदों को बहुत सहायता मिलेगी। लंबे समय से इसका इंतजार है। चूंकि समाज का 97 प्रतिशत हिस्सा इन समस्याओं से प्रभावित नहीं है इसलिए समस्या की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। क्या हम इस यथास्थिति को बदलना चाहेंगे?

एक समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि वह अपने सबसे कमजोर हिस्से को कैसे संभालता है। हमने अन्य सभी को योग्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया है, लेकिन जन्मजात विकार के साथ पैदा हुआ बच्चा हमेशा हमारी उपेक्षा का शिकार रहा है। जिस महान सभ्यता को हम मानते हैं, वहां अतिथि को भगवान माना जाता है, लेकिन परिवार में आने वाले नए सदस्य पर ध्यान देना हम भूल गए हैं। समय आ गया है कि देश की सरकार और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करे कि ऐसे बच्चों को न्याय मिले और उन पर ध्यान न देने की अनैतिक प्रथा समाप्त हो।

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