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सियासत के कारण नहीं सुधर पा रही है सियासत, चुनावी सुधार पर कुंडली मारकर बैठी है केंद्र सरकार

By शशिधर खान | Updated: June 29, 2022 14:20 IST

निर्वाचन आयोग ने केंद्रीय कानून मंत्रालय के पास जो चुनाव सुधार के छह प्रस्ताव भेजे हैं। उनमें दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दागी उम्मीदवारों का पर्चा रद्द करने का अधिकार देने वाला कानून बनाने/संशोधन लाने का प्रस्ताव नहीं दुहराया है।

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ठळक मुद्देचुनाव आयोग ने केंद्रीय कानून मंत्रालय के पास चुनाव सुधार के छह प्रस्ताव भेजे हैंआयोग एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने के लिए कानून में संशोधन चाहता हैवहीं आयोग ने यह प्रस्ताव भी भेजा है कि वोटर आईडी को आधार संख्या के साथ जोड़ा जाए

नए मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) राजीव कुमार ने पदभार ग्रहण करते ही केंद्रीय कानून मंत्रालय के पास चुनाव सुधार के छह प्रस्ताव भेजे। उन प्रस्तावों में नंबर वन है-एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने के लिए कानून में संशोधन किया जाए और नंबर दो है-वोटर आईडी (मतदाता पहचान पत्र) को आधार से जोड़ा जाए।

लेकिन निर्वाचन आयोग ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दागी उम्मीदवारों का पर्चा रद्द करने का अधिकार देने वाला कानून बनाने/संशोधन लाने का प्रस्ताव नहीं दुहराया।

चुनाव आयोग का यह आग्रह इस संवैधानिक संस्था के दायरे से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक जाकर इतना पिट चुका है कि ऐसा प्रस्ताव सरकार के पास भेजना आयोग के लिए व्यर्थ का शब्द और समय बर्बाद करने जैसा है। 30 वर्षों से चुनाव आयोग के जितने चुनाव सुधार प्रस्ताव सरकार के पास विचारार्थ लंबित हैं, उनमें सबसे पहला है दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार, ताकि राजनीति में अपराधीकरण पर रोक लगाई जा सके।

इतने वर्षों में जितनी सरकारें बनीं, किसी ने भी इस प्रस्ताव को तवज्जो नहीं दी और निर्वाचन आयोग की सुधार प्रस्ताव फाइल डंपखाने में पड़ी रही। आखिरकार चुनाव सुधार का सबसे अहम असली मुद्दा लगभग पूरी तरह गोल हो गया, जो निर्वाचन आयोग की ओर से सरकार के पास भेजे गए हालिया प्रस्तावों से स्पष्ट है। भाजपा गठजोड़ की 2014 में सरकार बनने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय भाजपा के ही नेता हैं। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में निर्वाचन आयोग ने बार-बार कहा कि कई वर्षों से सरकार से आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मांगा जा रहा है।

सरकार हर सुनवाई में अपने अटॉर्नी जनरल को खड़े करके किसी-न-किसी बहाने इस मामले पर टालो/पल्ला झाड़ो नीति अपनाती रही। चुनाव हो रहे हैं, दागी उम्मीदवार जीतकर आ रहे हैं। चुनाव आयोग ने कई बार सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि आपराधिक मुकदमे में फंसे उम्मीदवारों को टिकट न दें। अब चुनाव आयोग ने इस मुद्दे को चुनाव सुधार प्रस्तावों की सूची से निकाल दिया है।

अभी निर्वाचन आयोग की ओर से कानून मंत्रालय को भेजे गए प्रस्तावों में जो जनहित की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, उसे सरकार ने डंप ही रखा क्योंकि वो राजनीतिक हित में नहीं था लेकिन दूसरे प्रस्ताव की अधिसूचना तुरंत जारी कर दी गई। 12 जून को मुख्य चुनाव आयुक्त ने कानून मंत्रालय के पास प्रस्ताव भेजा और 18 जून को वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने की अधिसूचना कानून मंत्रालय ने जारी कर दी।

निर्वाचन आयोग ने एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून में संशोधन करने की मांग की थी। इसमें चुनाव आयोग का यह भी कहना था कि अगर ऐसा नहीं किया जा सके तो इस चलन पर रोक लगाने के लिए भारी जुर्माने का प्रावधान किया जाए। किसी उम्मीदवार के दो सीट पर जीतने की स्थिति में एक सीट खाली होने पर उपचुनाव की मजबूरी पैदा हो जाती है।

सरकार ऐसा चुनाव सुधार नहीं चाहती, चुनाव आयोग ने ओपिनियन और एग्जिट पोल पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग की, जिसमें कहा गया कि यह प्रतिबंध चुनाव अधिसूचना जारी होने के दिन से ही लागू हो जाना चाहिए और चुनाव परिणाम घोषित होने तक जारी रहना चाहिए।

इस पर भी सरकार ने विचार करना जरूरी नहीं समझा क्योंकि यह भी दलीय चुनाव राजनीति से जुड़ा मामला है। जिस पार्टी को एग्जिट पोल में जीत की ओर बढ़ना बताया जाता है, वो खुश होती है और हारने वाली प्रतिबंध की आवाज लगाती है। चुनाव आयोग के लिए मुश्किल हो जाती है, क्योंकि इसकी निष्पक्षता पर उंगली उठाई जाती है़।

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