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एन. के. सिंह का ब्लॉगः दोनों बड़े दलों के लिए संकेत

By एनके सिंह | Updated: December 12, 2018 02:29 IST

भारत के हृदय-क्षेत्न मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे कांग्रेस के लंबे सूखे से पैदा हुए रेगिस्तान में किसी नखलिस्तान की तरह हैं. जनता ने यह संदेश दिया है कि जन-भावनाओं को समझने में अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक कदम बढ़े तो जनता अगले दस कदम तक उनके इस्तकबाल के लिए खड़ी होगी.

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तीन राज्यों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सफलता के बाद  मोदी सरकार को अगले चार माह में होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर अपनी पूरी रणनीति बदलनी होगी. उधर कांग्रेस को मुग्ध न हो कर दो मोर्चो पर काम करना होगा- बेहतर गठबंधन और प्रतिबद्ध संगठनात्मक ढांचा, जो अभी लगभग गायब है. दरअसल मतदाताओं ने दोनों को संदेश दिया है- मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को वायदे की जगह काम करने की सलाह है तो कांग्रेस के लिए बेहतर गैर-भाजपा गठबंधन बनाने की.   कई बार भारत के बहुत पुराने और बड़े दल भी शासन में आने के बाद जो आम गलती करते हैं वह यह कि वे यह समझ नहीं पाते कि छोटे -छोटे नकारात्मक संदेश जो जनता के मन में सहज ही घर करते जाते हैं, कई बार उन्हीं से जनमत बनता है. उर्जित पटेल का जाना या ऐन वक्त पर किसी सहयोगी का मंत्नी पद से इस्तीफा देना, एक साल में चार बार देश भर के हजारों किसानों का दिल्ली में गैर-राजनीतिक रैली करना, किसानों का फसल के दाम कम मिलने पर आत्महत्या करना, जजों का प्रेस कांफ्रेंस करना, नोटबंदी का नकारात्मक प्रभाव या रोजगार के अवसर कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं.    

भारत के हृदय-क्षेत्न मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे कांग्रेस के लंबे सूखे से पैदा हुए रेगिस्तान में किसी नखलिस्तान की तरह हैं. जनता ने यह संदेश दिया है कि जन-भावनाओं को समझने में अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक कदम बढ़े तो जनता अगले दस कदम तक उनके इस्तकबाल के लिए खड़ी होगी. लिहाजा इस युवा नेता को राजनीति को 100 मीटर की रेस न मानते हुए मैराथन की दौड़ मानना होगा. 

हालांकि गुजरात चुनाव के बाद से राहुल के तौर-तरीके में व्यापक बदलाव आया है लेकिन इसमें तारतम्यता बनाए रखनी होगी.  उधर प्रधानमंत्नी मोदी और भाजपा के लिए जनता का संदेश यह है कि साढ़े चार साल बाद अब वादा वफा करने का वक्त भी खत्म हो रहा है. आज भी मोदी की व्यक्तिगत स्वीकार्यता देश में किसी भी अन्य नेता से काफी अधिक है, पर सन 2014 का जनोन्माद नहीं है. जो लोग मंदिर चाहते हैं और मंदिर वहीं बनाएंगे कहते हैं वह भी शाम को बच्चों के लिए रोजगार की कोशिश को इबादत से कम नहीं समझते. लिहाजा जो लोग जनता की नब्ज जानने के धंधे में हैं उन्हें अब यह सवाल  पूछना होगा कि  अगर कोई सरकार मंदिर बनाने का भरोसा दे लेकिन रोजगार देने की कोई गारंटी न दे या किसान की आय के लिए कुछ भी करने से असमर्थता जताए तो क्या उसे वोट देंगे तो जवाब कुछ और होगा. भोगा यथार्थ भावना पर हमेशा भारी पड़ता है.  पांच राज्यों के चुनाव परिणाम अगर एक स्पष्ट संकेत दे रहे हैं तो वह यह कि भावना ज्यादा दिनों तक रोटी पर, बीमारी के इलाज पर भारी नहीं पड़ सकती. लिहाजा चुनाव नजदीक आते ही 62 करोड़ गरीबों को फ्री स्वास्थ्य बीमा, फसल के समर्थन मूल्य में वृद्धि जैसी की जाने वाली घोषणाएं पहले ही होनी चाहिए थीं.

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