जाक ताती की प्लेटाइम, लॉरी बेकर का कॉफी हाउस और शहर का सपना

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 22, 2026 15:56 IST2026-04-22T15:53:51+5:302026-04-22T15:56:27+5:30

19वीं सदी के अंत से ही यूरोप तेजी से बदल रहा था. शहर फैल रहे थे, नई मशीनें आ रही थीं. पारंपरिक स्थापत्य शैलियां छीज रही थीं.

Jacques Tati's Playtime Laurie Baker's Coffee House and the Dream City blog Sunil Soni | जाक ताती की प्लेटाइम, लॉरी बेकर का कॉफी हाउस और शहर का सपना

सांकेतिक फोटो

Highlightsउपनगरों तक ऐसा भद्दा पुनर्निर्माण किया गया कि उसे ‘ब्रूटल आर्किटेक्चर’ कहा जाने लगा.आधुनिक शहर इंसान को भ्रमित, अलग-थलग और हास्यास्पद स्थिति में डाल देता है.दिलचस्प है कि जब लॉरी बेकर पैदा हुए, तब यूरोप में आधुनिक वास्तुकला आंदोलन जारी था.

सुनील सोनी

1967 में फ्रांसीसी फिल्मकार जाक ताती ने ‘प्लेटाइम’ बनाई, जो तत्कालीन आधुनिक, पर भद्दे शहरीकरण तथा स्थापत्य का मजाक उड़ाती है. यह वह वक्त था, जब फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल अर्थव्यस्था बढ़ाने के लिए पेरिस को आधुनिक शहर बनाने पर तुले थे. कला का आईना कहे जानेवाले पेरिस में ढेरों पुराने घर गिराए गए और कांच-स्टील की इमारतों को खड़ाकर उपनगरों तक ऐसा भद्दा पुनर्निर्माण किया गया कि उसे ‘ब्रूटल आर्किटेक्चर’ कहा जाने लगा.

ताती ने पुराने पेरिस को खोने के दर्द को दिखाने के लिए सिनेमा का रास्ता चुना, पर पूरे शहर का महंगा सेट और तब 70 एमएम में फिल्मांकन उन्हें ले डूबा. फिल्म इतनी बेहतरीन बनी कि सर्वकालिक महान 100 फिल्मों में 41वां स्थान मिला. यह फिल्म किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस अनुभव की कहानी है, जिसमें आधुनिक शहर इंसान को भ्रमित, अलग-थलग और हास्यास्पद स्थिति में डाल देता है.

‘प्लेटाइम’ जो शहर दिखाती है, वह आधुनिक सोच का चरम रूप है. कांच, स्टील, सीधी रेखाएं, एक जैसा डिजाइन; ताकि जीवन आसान व व्यवस्थित बने. लेकिन, लोग रास्ता भूलते हैं, दरवाजे भ्रमित करते हैं, एक जैसे क्यूबिकल की वजह से दफ्तर पहचान में नहीं आते. यानी जो व्यवस्था तर्कसंगत कही जाती है, वह नई अव्यवस्था है.

ताती ने फिल्म के मार्फत व्यंग्य किया है. लंबे संवाद के बजाय दृश्य से हास्य बनता है और आधुनिकता की धारणा पर चोट करता है कि एक जैसा डिजाइन हर जगह काम नहीं करेगा. हालांकि ताती आधुनिकता को खारिज नहीं करते, पर दिखाते हैं कि इंसानी बरताव, स्थानीय पहचान और अनिश्चितता को डिजाइन नजरअंदाज करे, तो सब कुछ विचित्र होगा और अंतत: विफल.

इस कहानी से भारत के विकसित हो रहे शहरों-कस्बों-गांवों, खास तौर पर बनारस की याद इतनी जोर से आती है कि ‘वास्तुकला के गांधी’ लाॅरी बेकर प्रासंगिक लगने लगते हैं, जिनके असंभव माने जाने वाले सपने ने भारत के हजारों बेघरों के लिए किफायती घर बनाने में मदद की. यह दिलचस्प है कि जब लॉरी बेकर पैदा हुए, तब यूरोप में आधुनिक वास्तुकला आंदोलन जारी था.

19वीं सदी के अंत से ही यूरोप तेजी से बदल रहा था. शहर फैल रहे थे, नई मशीनें आ रही थीं. पारंपरिक स्थापत्य शैलियां छीज रही थीं. कांच, स्टील और कांक्रीट ने ऐसी इमारतों का निर्माण आसान कर दिया, जो दुनिया में कहीं भी एक जैसी शैली में बनाई जा सकती थीं. इससे स्थानीयता कम होती चली गई. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में भारी आवास संकट था.

वास्तुविदों ने सोचा कि एक जैसे मकान बड़े पैमाने पर बनाने से सबको सस्ते घर मिल सकते हैं. जब एक जैसे अपार्टमेंट, ब्लॉक, टाॅवर हर जगह बनने लगे, तो शहरों की पहचान और मानवीय पैमाने कमजोर होने लगे. वैसे ही जैसा अब भारत में दिख रहा है, जबकि यूरोप-अमेरिका पर्यावरण अनुकूल घरों की ओर लौट रहे हैं. जो लॉरी बेकर चाहते थे.

लॉरी बेकर ने छात्र जीवन में ही तय कर लिया था कि पैसा कमाना जीवन का ध्येय नहीं होगा. वे जापानी आक्रमण से जूझ रहे चीन में कुष्ठ रोगियों की सेवा करने के लिए जाते हुए तीन माह तक भारत में रुके. सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी ने स्थापत्य की उनकी धारणा को हिला दिया. गांधीजी ने उनसे पूछा कि भारत जैसे गरीब देश में तुम आर्किटेक्चर से क्या करोगे?

और फिर सुझाव दिया कि महंगे-दिखावटी घर मत बनाना, आसपास मिलनेवाली सामग्री से घर बनाओ और ऐसे बनाओ कि गरीब भी खरीद सकें. बेकर यह मंत्र कभी नहीं भूले. चीन और पिथौरागढ़ में देहाती घर बनाने के तरीके, सामग्री, कौशल एवं समझ से उन्होंने स्थापत्य के नए नियम सीखे और केरल तक आजमाए. अद्‌भुत कारीगरी से सस्ती-सुंदर इमारतें बनाईं.

‘गांधीगीरी’ से बना तिरुवनंतपुरम का उनका घर ‘हैमलेट’ अब पर्यटन का केंद्र है. 1950 से 1990 के बीच बेकर ने छोटे घर, स्कूल, अस्पताल, चर्च, कई संस्थानों समेत हजार से अधिक इमारतें बनाईं. सामाजिक न्याय व उपयोगिता को उन्होंने खूबसूरती से बांध दिया. उनकी सबसे प्रसिद्ध तकनीकों में रैट-ट्रैप बांड ईंट है.

इसमें ईंटों को इस तरह लगाया जाता है कि दीवार के भीतर खाली स्थान बनता है, जिससे कम ईंट लगती है, लागत घटती है और ऊष्मारोध बेहतर होता है. जालीदार ईंट की दीवारें, हवादार रौशनदान और दक्षिणी हिस्से में धूप से पानी गर्म करने और कचरे से खाद बनाने के उपाय अब भी बेहतरीन हैं.

उनकी बनाई कुछ प्रमुख इमारतों में तिरुवनंतपुरम में इंडियन कॉफी हाउस की घुमावदार इमारत, सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज का परिसर महत्वपूर्ण हैं. गौतम हलदर ने लॉरी बेकर के जीवन, काम और आम लोगों के लिए बनाए उनके घरों को लेकर डॉक्युमेंटरी बनाई है : ‘एन ऑर्किटेक्ट ऑफ द पीपल.’ लॉरी बेकर के पोते विनीत राधाकृष्णन ने उनके जीवन एवं टिकाऊ वास्तुकला पर वृत्तचित्र बनाया ‘अनकॉमन सेंस : द लाइफ एंड वर्क ऑफ लॉरी बेकर.’

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