लोकतंत्र में टकराव नहीं, सहयोग से आगे बढ़ता है देश
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 22, 2026 15:38 IST2026-04-22T15:37:18+5:302026-04-22T15:38:31+5:30
जनप्रतिनिधि तीस लाख से भी अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता हो और कोई एक, दो या तीन लाख लोगों के ही वोटों से चुना जाता हो तो इसे किसी भी हालत में तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता.

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लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत यह है कि शासन व्यवस्था में हर व्यक्ति का समान प्रतिनिधित्व होना चाहिए. लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ सिद्धांत को अपनाया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि शासन व्यवस्था में हर व्यक्ति का समान प्रतिनिधित्व हो और अमीर व गरीब दोनों के वोट की अहमियत बराबर हो.
इसीलिए जाहिर है कि जब कोई जनप्रतिनिधि तीस लाख से भी अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता हो और कोई एक, दो या तीन लाख लोगों के ही वोटों से चुना जाता हो तो इसे किसी भी हालत में तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता. इसीलिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का यह कथन उचित है कि देश के प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को युक्तसंगत बनाया जाना चाहिए.
देश के लोकसभा क्षेत्रों में वर्तमान में कितनी असमानता है, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि देश के पांच लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 20 लाख से अधिक है और इनमें भी दो निर्वाचन क्षेत्र में तो 30 लाख से भी ज्यादा है, जबकि कई निर्वाचन क्षेत्रों में वोटर संख्या पांच लाख से भी कम है और लक्षद्वीप में तो मात्र 58 हजार मतदाता हैं.
इससे मतदाताओं के प्रतिनिधित्व में तो असमानता पैदा होती ही है, अत्यधिक मतदाता संख्या वाले क्षेत्रों के सांसद के लिए अपने क्षेत्र की जनआकांक्षाओं को पूरा कर पाना भी संभव नहीं होता. इसलिए बकौल अमित शाह, प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को तर्कसंगत बनाने के लिए परिसीमन प्रक्रिया आवश्यक है.
लेकिन दक्षिण के राज्यों को परिसीमन से डर यह है कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रतिनिधित्व का प्रतिशत उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले कम हो जाएगा और संसद में उनकी आवाज दब जाएगी. दरअसल पिछले कुछ दशकों में उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में बेहतर काम किया है.
इसलिए दक्षिण के राज्यों को डर है कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया तो उनकी राजनीतिक शक्ति आनुपातिक रूप से कम हो जाएगी. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में आश्वासन दिया है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और दक्षिणी राज्यों की सीटों में भी लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि (उदाहरण के लिए तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59) की जाएगी ताकि उनका आनुपातिक हिस्सा बना रहे. फिर भी विपक्षी दल और दक्षिण के मुख्यमंत्री (जैसे एम.के. स्टालिन) अभी भी इसे लेकर विरोध जता रहे हैं.
लेकिन सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा कि संघीय शासन प्रणाली वाले देश में टकराव का रास्ता अपनाना लोकतंत्र के हित में नहीं है और सभी दलों को मिल-बैठ कर कोई सर्वमान्य हल निकालना होगा, तभी केंद्र और राज्यों के संबंध सद्भावपूर्ण बने रह पाएंगे और पूरा देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ सकेगा.