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एआई चिप: छोटे पुर्जे के लिए बड़ी लड़ाई, मार्केट कैप 4.19 ट्रिलियन डॉलर को पार

By अभिषेक कुमार सिंह | Updated: July 24, 2025 05:18 IST

AI chips: बिजनेस पत्रिका फोर्ब्स ने बताया कि हाल में एनवीडिया का मार्केट कैप पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा 4.19 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया.

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ठळक मुद्दे एनवीडिया ने वह मुकाम छू लिया, जिस पर आज तक कोई नहीं पहुंच पाया था. अनुमान लगाया जा सकता है कि इस कंपनी ने कामयाबी का कौन सा स्तर छुआ है.एनवीडिया जो चिप बनाती है, उन्हें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स यानी जीपीयू कहा जाता है.

तकनीक और प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर बड़ी क्रांतियां अक्सर चुपचाप होती हैं. भारत बीपीओ और आईटी उद्योग में सॉफ्ट स्किल को लेकर शिखर पर पहुंच गया, बीते ढाई-तीन दशकों में यह कहानी किंवदंती बन गई. भारत के युवाओं ने इसके लिए कोई ढोल-नगाड़ा नहीं पीटा, इसके लिए कहीं कोई बड़ा तमाशा नहीं खड़ा किया गया. ठीक इसी तरह हाल ही में एआई चिप बनाने वाली एक कंपनी- एनवीडिया ने वह मुकाम छू लिया, जिस पर आज तक कोई नहीं पहुंच पाया था. बिजनेस पत्रिका- फोर्ब्स ने बताया कि हाल में एनवीडिया का मार्केट कैप पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा 4.19 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया.

यह पूंजी भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से ज्यादा है, इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस कंपनी ने कामयाबी का कौन सा स्तर छुआ है. एनवीडिया ने यह जो कारनामा किया है, उसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते चलन के कारण एआई चिप्स की मांग में आई तेजी की भूमिका है. एनवीडिया जो चिप बनाती है, उन्हें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स यानी जीपीयू कहा जाता है.

यह एआई इंडस्ट्री की रीढ़ है. ध्यान रहे कि ये एक प्रकार के सेमीकंडक्टर चिप्स हैं, जिनका आज की तारीख में हर देश फैक्ट्रियां लगा अपने यहां उत्पादन करना चाहता है. हाल ही में, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में दावा किया कि भारत की पहली मेड इन इंडिया सेमीकंडक्टर चिप इसी साल लॉन्च कर दी जाएगी.

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में एक बड़ा वैश्विक खिलाड़ी बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि देश में इसके लिए छह सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को मंजूरी दी गई है. यही नहीं, इंडिया एआई मिशन के तहत अब तक देश में 10 लाख लोगों को एआई की ट्रेनिंग भी दी जा चुकी है, ताकि लोग इस तकनीक को समझ सकें और अपना सकें.

इस बयान को एक आधार मानें तो कह सकते हैं कि भारत सरकार का ज्यादा जोर सेमीकंडक्टर उद्योग में देश का एक बड़ा मुकाम बनाने पर है. पर क्या इसका रास्ता आसान है? कोरोना वायरस से पैदा महामारी कोविड-19 के दौर में दुनिया ने देखा कि कैसे सप्लाई चेन प्रभावित होने से पूरी दुनिया में सेमीकंडक्टर की आपूर्ति थम गई.

इस कारण स्मार्टफोन, वॉशिंग मशीन, कम्प्यूटर से लेकर स्मार्ट कारों तक के निर्माण में काफी देरी हुई क्योंकि इन सभी में सेमीकंडक्टर चिप्स का इस्तेमाल होता है. इसके बाद 2022 से जब चैटजीपीटी के अभ्युदय के साथ जेनरेटिव एआई की तकनीक सामने आई, तो इन सेमीकंडक्टरों की मांग में कई गुना इजाफा और हुआ है.

एनवीडिया के कामकाज और शेयरों में जो बढ़ोत्तरी हुई है, वह इन्हीं तीन वर्षों में हुई है क्योंकि इसी अवधि में दुनिया में जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते चलन के कारण एआई चिप्स की डिमांड बढ़ी है. साफ है कि सेमीकंडक्टर चिप्स के निर्माण को लेकर तेजी और इसकी तकनीक को लेकर छीनाझपटी अगले कुछ दशकों तक और जारी रह सकती है.

इस सेमीकंडक्टर चिप की खूबी यही है कि इसे विभिन्न जरूरतों के हिसाब से ढालकर कहीं भी लगा दो, वहां यह अपना करिश्मा दिखा सकती है.  यानी कहने को तो यह एक छोटा पुर्जा है, लेकिन इसके कमाल काफी बड़े हो सकते हैं. यह एक विरोधाभासी विडंबना है कि जिस कम्प्यूटर-आईटी में भारत खुद को अपनी युवाशक्ति-प्रतिभा के बल पर शीर्ष पर मानता रहा है,

वह देश उसी क्षेत्र से जुड़े एक उत्पाद के निर्माण में निहायत फिसड्डी रहा है. इसकी एक वजह हो सकती है कि हमारे देश का अब तक मुख्य फोकस सर्विस सेक्टर (आईटी की सेवाएं आदि) पर रहा. हमारी कोशिश सॉफ्टवेयर में आगे बढ़ने की रही, न कि मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) के क्षेत्र में झंडा गाड़ने की.

हालांकि कोविड महामारी के दौर में पैदा हुए संकट ने सरकार को इस मार्चे पर काम करने के लिए प्रेरित किया. दूसरी समस्या यह है कि सेमीकंडक्टर बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कोई नया देश इसे रातोंरात नहीं बना सकता. किसी तरह वह ऐसा कर भी ले तो उसकी लागत वहन करना उसके बूते के बाहर हो सकता है.

 ‘सिलिकॉन शील्ड’ के इस रूपक का दूसरा पहलू इसकी निर्माणगत प्रक्रिया से जुड़ा है. तात्पर्य यह है कि सेमीकंडक्टर बनाने में जो विज्ञान और तकनीक लगती है, कोई देश या कोई कंपनी उसमें रातोंरात पारंगत नहीं हो सकती. लेकिन सही सरकारी नीतियां अपनाकर और रास्ते में आने वाली बाधाओं को खत्म करके सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामानों के आयात के मामले में ताइवान, चीन, जापान या दक्षिण कोरिया पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करते हुए खत्म किया जा सकता है.

इस बारे में व्यापारिक संगठन पीएचडी चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत चीन से 40 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक इम्पोर्ट घटा सकता है- बशर्ते यहां कुछ चीजों पर ठोस अमल किया जाए. जैसे केंद्र सरकार सबसे पहले तो पीएम गति शक्ति स्कीम के तहत मिलने वाली रियायतों को ईमानदारी से लागू करे.

साथ ही सरकार को चाहिए वह भारतीय उत्पादकों की इस भावना का ध्यान रखे कि वो प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद तैयार कर सकें.  साथ ही देश में इलेक्ट्रॉनिक के साथ-साथ केमिकल्स, ऑटोमोटिव पुर्जों, साइकिल और कॉस्मेटिक्स का उत्पादन बढ़ाया जाए. यह सही है कि ‘लो कॉस्ट लो वैल्यू’ के फॉर्मूले पर बनी सस्ती चीनी वस्तुओं के मुकाबले में भारत की छोटी कंपनियों के उत्पाद ठहर नहीं पाते हैं,

लेकिन इसका उपाय यह है कि सरकार ऐसी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में टिकाए रखने के लिए इंसेंटिव पैकेज दे.  इतना तय है कि सेमीकंडक्टर या कहें कि माइक्रोचिप्स का उत्पादन भारत में ही होने से न केवल भारत का आयात बिल कम होगा, बल्कि नौकरियों के सृजन के साथ मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में भी भारत की धाक जम सकेगी.

टॅग्स :आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसचीनअमेरिकादिल्ली
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