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World Puppetry Day: प्ले स्टेशन और इंटरनेट के जमाने में खो गया है कठपुतली का खेल

By मेघना वर्मा | Updated: March 21, 2018 10:07 IST

पहले कठपुतली कलाकार अपने ग्रुप के साथ गांव-गांव घूमते थे और तरह-तरह की कहानियों के नाटक दिखाकर अपना गुजारा करते थे।

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कठपुतली या पपेट जैसा शब्द शायद ही अब किसी के जुबान पर सुनाई देता हो, इंटरनेट और पीवीआर के जमाने में बरसों पुराने कठपुतलियों के खेल को कंही गुम हो गया है। आज विश्व कठपुतली दिवस या वर्ल्ड पपेट डे पर हम देश और दुनिया में होने वाले इन्हीं कठपुतलियों के खेलों और इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका निशान शायद अब कहीं नहीं बचा है। 

ग्रंथों और पुराणों से हुआ है इनका जन्म

कठपुतली शब्द संस्कृत भाषा के 'पुत्तलिका' या 'पुत्तिका' और लैटिन के 'प्यूपा' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है-छोटी गुड़िया।सालों पहले कठपुतली कला का जन्म भारत में हुआ था। माना जाता है कि दूसरी शताब्दी में लिखे तमिल महाकाव्य 'शिल्पादीकरम' से इसका जन्म हुआ। वहीं कई लोग चौथी शताब्दी में लिखे 'पाणिनी' ग्रंथ के पुतला-नाटक और 'नाट्यशास्त्र' से इनका जन्म हुआ है।

देश भर में हुआ इस कला का विकास

पहले कठपुतली कलाकार अपने ग्रुप के साथ गांव-गांव घूमते थे और तरह-तरह की कहानियों के नाटक दिखाकर अपना गुजारा करते थे। इससे कठपुतली कला का विस्तार पूरे देश में हो गया और यह अलग-अलग राज्यों की भाषा, पहनावे और लोक-संस्कृति के रंग में रंगने लगी। अंग्रेजी शासनकाल में यह कला विदेशों में भी पहुंच गई। आज यह कला इंडोनेशिया, थाईलैंड, जावा, श्रीलंका, चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, अमरीका, जापान में पहुंच चुकी है।

विदेशों में होता है इनका मंचन

यूरोप में अनेक नाटकों की भांति कठपुतलियों के नाटक भी होते हैं। विशेषत: फ्रांस में तो इस खेल के लिए स्थायी रंगमंच भी बने हुए हैं जहां नियमित रूप से इनके खेल खेले जाते हैं। वे चलती हैं, नाचती हैं और प्रत्येक काम ऐसी सफाई से करती हैं मानों वे सजीव हों। इन कठपुतलियों से जो मंतव्य प्रकट कराना है उसको परदे के पीछे हुए छिपे हुए आदमी माइक्रोफ़ोन द्वारा इस खूबी से कहते हैं मानों ये कठपुतलियां खुद बोल पड़ी हों। चलनेवाली डोर बहुत पतली और काली होती है, पृष्ठभूमि का परदा भी काला रहता है, इसलिए डोर दिखलाई नहीं पड़ती। एक व्यक्ति साधारणत: छह डोरें चलाता है। अधिक से अधिक वह आठ चला सकता है। जब रंगमंच पर कठपुतलियों की संख्या अधिक होती है तब उनको चलाने के लिए कई व्यक्ति रहते हैं।

कठपुतली कला में बदलाव

हमारे देश में कठपुतली कला के स्वरूप में खासे बदलाव देखे जा सकते हैं। आज इनमें महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन जैसे विषयों पर आधारित कार्यक्रम, हास्य-व्यंग्य और शैक्षणिक कार्यक्रम भी दिखाए जाते हैं। पहले जहां इनके प्रदर्शन में लैंप और लालटेन का इस्तेमाल होता था, आज कठपुतली कला के बड़े-बड़े थियेटर में शोज किए जाते हैं।

देश में नाटक का जन्मदाता है कठपुतली का खेल

कठपुतलियों का यह खेल कलाओं की उन विधाओं में से है जिन्होंने अन्य कलाओं को जन्म भी दिया है और जो स्वयं भी समानांतर रूप से जीवित रहती हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि नाटक का आरंभ कठपुतली के खेल से ही हुआ। विद्वानों का मानना है कि कठपुतली के खेल की उत्पत्ति भारत में ही हुई जहां से वह बाद में पाश्चात्य देशों में फैल गई। माना ये भी जाता है कि भारत में नाटक की उत्त्पति कठपुतलियों के खेल से ही हुई है। 

दुनिया भर में कठपुतली कला

'कार्निवल कठपुतली'

इस तरह की कठपुतली का इस्तेमाल किसी बड़े समारोह में किया जाता है। यह काफी बड़ी कठपुतली होती है। कलाकारों का एक ग्रुप होता है, जो कठपुतली के अंदर जाकर इसे चलाता है। चीन में न्यू ईयर के मौके पर इस्तेमाल की जाने वाली ड्रेगन कठपुतली इसका उदाहरण है।

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'हाथ या दस्ताना (हैंड) कठपुतली'

17वीं शताब्दी में चीन में इसका जन्म माना जाता है। यह कठपुतली एक दस्ताने की तरह हाथ में फिट हो जाती है। आमतौर पर कठपुतली का सिर कलाकार के हाथ के बीच की उंगली में और उसके हाथ अंगूठे और पहली छोटी उंगली में डाले जाते हैं।

'धागा या स्ट्रिंग कठपुतली'

भारत में धागा कठपुतली सबसे ज्यादा मशहूर है। कठपुतली के सिर, गर्दन, बाजू, उंगलियों, पैर जैसे हर जोड़ पर धागा बंधा होता है, जिसकी कमान कठपुतली-चालक के हाथ में होती है।

'रॉड कठपुतली'

इस तरह की कठपुतली के सिर और हाथ को एक रॉड से नियंत्रित किया जाता है। इसकी शुरुआत इंडोनेशिया में हुई। 

'छाया या शेडो कठपुतली'

इसे सबसे पुरानी शैली माना जाता है। कठपुतलियां लैदर, पेपर, प्लास्टिक या लकड़ी से बनाई जाती हैं। इसके शोज प्रकाश व्यवस्था पर निर्भर करते हैं, जिससे कठपुतली के हाव-भाव और आकार साफ तौर पर दिखाई देते हैं। इसकी शुरुआत भारत और चीन में मानी जाती है।

भारत में कठपुतली

राजस्थान की स्ट्रिंग कठपुतलियां दुनिया भर में मशहूर हैं। इसके अलावा उड़ीसा, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी कठपुतलियों की यही कला प्रचलित है। राजस्थानी कठपुतलियों का ओवल चेहरा, बड़ी आंखें, धनुषाकार भौंहें और बड़े होंठ इन्हें अलग पहचान देते हैं।  5-8 स्ट्रिंग्स से बंधी ये कठपुतलियां राजस्थानी संगीत के साथ नाटक पेश करती हैं।  

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