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राष्ट्रपति चुनाव का वो किस्सा जब खुद इंदिरा गांधी ने हरवा दिया था कांग्रेस के प्रत्याशी को, जानिए 'अंतरात्मा की आवाज' का वो मशहूर वाकया

By आशीष कुमार पाण्डेय | Updated: June 25, 2022 14:23 IST

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भारत का गणराज्य अपने 15वें राष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी कर रहा है और इसके लिए सियासी दमखम भी अभी से शुरू हो गये हैं। केंद्र में सत्ताधारी एनडीए ने ओडिशा की द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपत चुनाव के लिए अपना कैंडिडेट बनाया है तो विपक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के पीछे लामबंद है। राष्ट्रपति चुनाव में एमडीए प्रत्याशी दौपदी मुर्मू का पड़ला भारी नजर आ रहा है लेकिन यशवंत सिन्हा भी अपने तरीके से चुनौती देने में लगे हुए है।देश में जब-जब राष्ट्रपति का चुनाव होता है, इंदिरा गांधी की छवि जहन में खुद-ब-खुद उभर आती है। दरअसल इस राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा इंदिरा गांधी का किस्सा भारत के राजनैतिक इतिहास में इस तरह से जुड़ा है कि उसे सदियों तक याद किया जाएगा, तो क्या था वो रोचक किस्सा, जानना चाहते हैं, तो हम बता रहे हैं आपको।इंदिरा गांधी के कारण राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि जब चुनाव नतीजे के लिए सेंकेंड प्रिफरेंस यानी दूसरी वरीयता के मतों की गिनती करनी पड़ी थी। इंदिरा गांधी के कारण सत्ता पक्ष का प्रत्याशी राष्ट्रपति का चुनाव हार गया था। राष्ट्रपति चुनाव के कारण कांग्रेस पार्टी दो भागों में टूट गई थी।जी हां, वक्त था अगस्त 1969 का और मौका था देश के पांचवें राष्ट्रपति के चुनाव का। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन का पद पर रहते हुए निधन हो गया था। साल 1969 से पहले तक उपराष्ट्रपति ही राष्ट्रपति बना करते थे, लेकिन कांग्रेस का सिंडिकेट ग्रुप, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज, निजलिंगप्पा और अतुल्य घोष औऱ तत्कलीन लोकसभा अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी शामिल थे, वो उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को उनकी ट्रेन यूनियन नेता की छवि और दक्षिणपंथी झुकाव के कारण उतना पसंद नहीं करती थी। इसलिए कांग्रेस ने वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनाने की बजाय का नीलम संजीव रेड्डी के नाम पर मुहर लगाई।  कांग्रेस के भारी अंतर्रकलह से जूझ रही इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव से कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज, निजलिंगप्पा और अतुल्य घोष के वर्चस्व को तोड़ते हुए ऐसा पासा फेंका कि नेहरू के समकालीन इन सभी नेताओं की ख्वाहिशें धरी की धरी रह गईं और इंदिरा गांधी ने अपने अकेले के दम पर वीवी गिरि को राष्ट्रपति का चुनाव जितवाकर राष्ट्रपति बना दिया। जी हां, ‘स्वतंत्र’ उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के ‘आधिकारिक’ उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को करारी शिकस्त दी और उसके पीछे खुद इदिरा गांधी खड़ी थीं।लेकिन ऐसा नहीं था कि इंदिरा गांधी ने वीवी गिरि को ही राष्ट्रपति बनवाना चाहती थी, 10 जुलाई 1969 को इंदिरा गांधी ने बेंगलौर में हुई कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में राष्ट्रपति पद के लिए अपनी ओर से जगजीवन राम का नाम आगे बढ़ाया लेकिन चूंकि पार्टी में संख्या बल सिंडिकेट ग्रुप के साथ था इसलिए इंदिरा गांधी का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया और पार्टी ने नीलम संजीव रेड्डी के नाम की घोषणा कर दी। इंदिरा गांधी इस बात से तिलमिला उठीं और जैसे नीलम संजीव रेड्डी ने राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा भरा उन्होंने वीवी गिरि से संपर्क किया और कहा कि वो भी स्वतंत्र उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव में खड़े हों। पहले तो वीवी गिरि पशोपेश में पड़े लेकिन इंदिरा गांधी के आश्वासन पर उन्होंने नीलम संजीव रेडड्ी के खिलाफ नामांकन दाखिल कर दिया। कांग्रेस का सिंडिकेट ग्रुप इस बात को समझ रहा था कि वीवी गिरि को चुनाव में खड़े होने की ताकत खुद इंदिरा गांधी दे रही हैं, पार्टी ने कहा कि रेड्डी को वोट देने के लिए व्हिप जारी होगा लेकिन इंदिरा गांधी ने 1952 के प्रेसिडेंशियल एंड वाइस प्रेसिडेंशियल एक्ट का हवाला देते हुए रेड्डी के पक्ष में व्हिप जारी से इनकार कर दिया। जब सिंडिकेट ने इसका विरोध किया तो इंदिरा गांधी कांग्रेस सदस्यों को खुलकर ‘अंतरात्मा के आधार पर वोट’ करने की अपील कर दी। इसका नतीजा हुआ कि वीवी गिरि के पक्ष में 163 कांग्रेसी सांसदों ने वोट किया। चुनाव में कुल 8,36,337 वोट पड़े थे। जीत के लिए 4,18,169 वोट चाहिए थे और वीवी गिरि को 4,01,515 मिले जबकि नीलम संजीव रेड्डी को 3,13,548 मत मिले और रेड्डी चुनाव हार गये। और इस तरह से सिंडिकेट के लाख विरोध के बावजूद इंदिरा गांधी ने वीवी गिरि के तौर पर ‘अपनी पसंद का राष्ट्रपति’ बना लिया। लेकिन इसका सबसे भयानक परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस के दोनों गुटों में तनातनी बढ़ गई और आजादी से पहले गठित हुई यह पार्टी 84 सालों के बाद कांग्रेस आर यानी रिक्विजशनल और कांग्रेस ओ यानी ऑर्गनाइजेशनल में बंट गई।
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