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नागा साधुओं की तरह कुंभ क्यों नहीं जाते अघोरी बाबा, जानें ये क्यों खाते हैं मुर्दों का मांस

By गुलनीत कौर | Updated: January 14, 2019 12:35 IST

नागा और अघोरी दो अलग प्रकार के साधु हैं। इनकी वेशभूषा से लेकर इनके तप करने के तरीके, इनका रहन-सहन, इनकी साधना और इनकी साधु बनने की प्रक्रिया में भी बड़ा अंतर देखा जा सकता है।

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कुंभ के मेले में निर्वस्त्र, तन पर भस्म लगाए हुए, लाल आंखें, खुली जटाएं, हाथों में कमंडल, त्रिशूल और मुख पर भगवान शिव का नाम, कुछ ऐसे होते हैं नागा साधु। कुंभ के दौरान इन्हें भारी तादाद में देखा जा सकता है। कुंभ में नागा साधु अपने अखाड़ों में दिखाई देते हैं। लोग इनसे मिलने आते हैं, इनका आशीर्वाद लेते हैं और अपनी समस्या का हल पाते हैं। मगर लोग अक्सर नागा साधु और अघोरी साधु को एक ही मां लेते हैं। जबकि ये साधुओं के दो अलग प्रकार हैं और इनमें कई अंतर हैं। 

नागा और अघोरी दो अलग प्रकार के साधु हैं। इनकी वेशभूषा से लेकर इनके तप करने के तरीके, इनका रहन-सहन, इनकी साधना और इनकी साधु बनने की प्रक्रिया में भी बड़ा अंतर देखा जा सकता है। भले ही दोनों ही साधारण साधुओं की तुलना में अलग दीखते हैं। इनका भयावह रूप लोगों को दुविधा में दाल देता है और यही कारण है कि लोग नागा और अघिरोयों को एक मान लेते हैं। चलिए आपको इन दोनों के बीच के पांच बड़े अंतर बताते हैं।

1) साधु बनने की प्रक्रिया

नागा और अघोरी साधु दोनों को ही साधु बनने के लिए कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। इन दोनों साधुओं की परीक्षा को 12 वर्ष का समय लगता है, अंतर केवल इतना है कि नागा साधु बनने के लिए नागा आखाड़ों में परीक्षाएं ली जाती हैं। जबकि अघोरी बनने के लिए श्मशान में तपस्या करनी होती है।

नागा साधु बनने के लिए सबसे पहले एक गुरु निर्धारित किया जाता है। यह गुरु नागा अखाड़े का कोई भी बड़ा विद्वान हो सकता है। उसकी देखरेख करके, उसकी सेवा करके कठिन परिश्रम से नागा साधु के अगले पड़ाव पर पहुंचा जाता है। 

अघोरियों का तप श्मशान से शुरू होता है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि श्मशान में भगवान शिव का वास होता है। इन्हें शिव के पांच अवतारों में से एक माना जाता है। सामान्य जन श्मशान में रात्रि के समय नहीं जाते हैं, ऐसे में इनकी तपस्या में विघ्न भी नहीं पड़ता है, इसलिए ये श्मशान में तप करते हैं। अघोरी साधु मुर्दे पर बैठकर या फिर मुर्दे के पास बैठकर कठोर तप करते हैं। ऐसा करने से ही उन्हें विभिन्न दैवीय शक्तियों की प्राप्ति होती है।

2) नागा और अघोरी बाबा का पहनावा

नागा साधु निर्वस्त्र घूमते हैं। कुंभ मेला समाप्त हो जाने के बाद ये लोग हिमालय की ओर रवाना हो जाते हैं, वहां भी ये ज्यादातर निर्वस्त्र ही रहते हैं। तेज ठंड में भी निर्वस्त्र रहकत कठोर तपस्या करते हैं। किन्तु अघोरी बाबा निर्वस्त्र नहीं रहते हैं। ये जानवर के खाल से अपने तन का निचला हिस्सा ढकते हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे भगवान शिव करते थे। 

3) नागा और अघोरी बाबा का भोजन

नागा और अघोरी बाबा दोनों ही मांस का भक्षण करते हैं। नागा साधुओं में कुछ शाकाहारी भी होते हैं, किन्तु अघोरी साधु कभी भी शाकाहारी नहीं होते। ये लोग ना केवल जानवरों का बल्कि इंसान के मांस का भक्षण भी करते हैं। परंतु इसके लिए वे खुद से इंसानों को नहीं मारते। मुर्दे के मांस का सेवन करते हैं।

4) परिवार से दूर

नागा और अघोरी बाबा दोनों ही परिवार से दूर रहते हैं। ये लोग पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वैराग्य में अपना जीवन बिताते हैं। ये लोग साधु बनने से पूर्व अपना ही श्राद्ध करते हैं और उस दौरान अपने परिवारजनों को त्याग देने का भी प्रण लेते हैं। दुनिया के लिए ये मृत हो जाते हैं और अपनी तपस्या के लिए दुनिया की भीड़ के बीच से गायब हो जाते हैं। 

5) कुंभ मेले में साधु

अघोरी कभी भी श्मशान से बाहर नहीं आते हैं। ये लोग या तो श्मशान में रहते हैं या फिर एक ऐसी जगह पर वास करते हैं जहां आसपास भी कोई ना आता हो। मगर नागा साधु लाखों की संख्या में कुंभ के दौरान दिखाई देते हैं। कुंभ के बाद भी इन्हें हिमालय की पहाड़ियों पर देखा जा सकता है। कहते हैं कि नागा साधु और उसके बाद अघोरी साधु के दर्शन करना, शिव के दर्शन के बराबर होता है।

6) नागा और अघोरी बाबा की शक्ति

वैराग्य का जीवन बिताते हुए कठोर तप करने वाले नागा साधुओं पर ईश्वरीय कृपा होती है। ये लोग आम जनमानस की कठिनाईयों को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। दूसरी ओर अघोरी बाबा तांत्रिक साधनाओं के लिए जाने जाते हैं। ये तंत्र-मंत्र के माध्यम से लोगों की परेशानियों का हल निकालते हैं। 

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