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लोकसभा चुनाव: इस बार सियासी पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार बना दलबदल, BJP ने कांग्रेस को दिए तगड़े झटके

By महेश खरे | Updated: May 1, 2019 07:54 IST

चुनावी सभाओं और स्टार प्रचारकों के आगमन पर भाषणों और जनसंपर्क के साथ खेस बदल कार्यक्रम अनिवार्य रूप से आयोजित किए जाते रहे. दलबदल के कारण सौराष्ट्र, उत्तर और मध्य गुजरात में कांग्रेस को तो कार्यकर्ताओं के टोटे ही पड़ गए.

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ठळक मुद्देगुजरात में लोकसभा की 26 सीटों के चुनावों के साथ-साथ विधानसभा की चार सीटों के उपचुनाव भी कराए गए. इन चारों उपचुनाव के पीछे भी दलबदल की ही कहानी है. कांग्रेस की अगर बात करें तो उसे इस चुनाव में जहां अपने पुराने साथी अल्पेश ठाकोर को खोना पड़ा तो हार्दिक पटेल को कांग्रेस में शामिल भी कर लिया गया.हार्दिक के साथियों का वर्चस्व हो जाने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज होकर या तो घर बैठ गया अथवा निर्दलीयों के पक्ष में काम करने लगा.

गुजराती मॉडल में दलबदल अपनी पैठ और पहचान बनाता जा रहा है. अनेक पुराने चेहरे चुनावी पिच से इसलिए बाहर कर दिए गए, क्योंकि उनकी सीट पर पाला बदलकर आए नेताओं को एडजस्ट करने की नीति अपनाई गई. लोकसभा चुनाव में इस बार दलबदल सियासी पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार बना.कांग्रेस को इस मामले में भाजपा ने तगड़े झटके दिए. चुनावी सभाओं और स्टार प्रचारकों के आगमन पर भाषणों और जनसंपर्क के साथ खेस बदल कार्यक्रम अनिवार्य रूप से आयोजित किए जाते रहे. दलबदल के कारण सौराष्ट्र, उत्तर और मध्य गुजरात में कांग्रेस को तो कार्यकर्ताओं के टोटे ही पड़ गए. विधानसभा चुनाव में जहां जहां कांग्रेस को बढ़त मिली थी वहां आयाराम गयाराम का खेल जम कर चला.उपचुनाव में पार्टी बदली, चेहरे पुराने गुजरात में लोकसभा की 26 सीटों के चुनावों के साथ-साथ विधानसभा की चार सीटों के उपचुनाव भी कराए गए. इन चारों उपचुनाव के पीछे भी दलबदल की ही कहानी है. कांग्रेस के पांच विधायकों ने पाला बदलकर भाजपा का केसरिया खेस धारण कर लिया है. कांग्रेस छोड़ने के कारण इन्हें विधायकी से भी इस्तीफा देना पडा. एक सीट पर तो उपचुनाव पहले ही हो चुका है. अब चार सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं. इनमें चेहरे वही पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन अब वो भाजपा के प्रत्याशी हैं. 23 मई को लोकसभा के साथ विधानसभा उपचुनाव के मतों की गिनती भी हो जाएगी.दोनों दलों में रहा असंतोष दो दिन पहले पाला बदल कर पार्टी में प्रवेश करने वालों को तरजीह मिलने के कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष देखा गया. पर इसकी परवाह दोनों दलों के नेताओं ने जरा भी नहीं की. उपेक्षा से नाराज नेताओं ने या तो घर बैठना उचित समझा या प्रतिक्रि या स्वरूप भी दलबदल कर लिया.हार्दिक को महत्व से भी नाराजगी कांग्रेस की अगर बात करें तो उसे इस चुनाव में जहां अपने पुराने साथी अल्पेश ठाकोर को खोना पड़ा तो हार्दिक पटेल को कांग्रेस में शामिल भी कर लिया गया. लेकिन हार्दिक और उनके साथियों को पार्टी में महत्व मिलने से पुराने कांग्रेसी अलग-थलग पड़ गए. अहमदाबाद पूर्व, राजकोट और पोरबंदर जैसी महत्वपूर्ण तीन लोकसभा सीटें हार्दिक कोटे में चली गई. यहां हाल ही में कांग्रेस से जुडे पाटीदार चेहरों को टिकट मिल गए और पुराने कांग्रेसी टापते रह गए.चुनाव पर पड़ा असर हार्दिक के साथियों का वर्चस्व हो जाने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज होकर या तो घर बैठ गया अथवा निर्दलीयों के पक्ष में काम करने लगा. अहमदाबाद की दोनों सीटों और गांधीनगर सीट पर यह असंतोष मुखर हुआ. कांग्रेस के प्रचार कार्य पर तो इसका विपरीत असर हुआ ही मतदान के दिन बूथों पर भी कार्यकर्ताओं की कमी पड़ गई.

टॅग्स :लोकसभा चुनावगुजरातकांग्रेसभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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