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रोजगारः बेरोजगारी के ऊंट को आरक्षण का जीरा! जानें कितना फायदेमंद है मोदी सरकार का 'जनरल कोटा'

By प्रदीप द्विवेदी | Updated: January 9, 2019 08:24 IST

आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के अनुरूप 15 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिया जाना था, लेकिन 10 प्रतिशत ही प्रस्तावित है। इसके जो आर्थिक पैमाने हैं, उससे वास्तविक गरीबों को शायद ही लाभ मिले।

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पीएम मोदी सरकार की ओर से सवर्णों को आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के निर्णय से यह मुद्दा जरूर गर्मा गया है, लेकिन सामाजिक संगठन ही नहीं, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत भी इसकी प्रतिशत संख्या से सहमत नहीं हैं। इसीलिए इस निर्णय को बेरोजगारी के ऊंट को आरक्षण का जीरा, माना जा रहा है।

सीएम अशोक गहलोत का कहना है कि- पूरे देश के अंदर पहली सरकार हमारी थी 1998 में।।। हमारा ईबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव था। सरकार को 10 नहीं, 14 प्रतिशत की जो मांग थी उसके आधार पर ही फैसला करना चाहिए, संविधान में संशोधन करना चाहिए तत्काल, आरक्षण मिलना चाहिए, यह हमारी राजस्थान कांग्रेस सरकार की 20 साल पुरानी मांग थी!दरअसल, इस फैसले में तीन प्रमुख मुद्दे उभर कर आए हैं जो इस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। 

पहला- आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के अनुरूप 15 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिया जाना था, लेकिन 10 प्रतिशत ही प्रस्तावित है, जबकि मोदी सरकार के ही रामदास अठावले जैसे मंत्री बीस प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव काफी समय पहले ही दे चुके हैं। 

दूसरा- इसके जो आर्थिक पैमाने हैं, उससे वास्तविक गरीबों को शायद ही लाभ मिले।

 तीसरा- जब तक नौकरियों के लिए कोई ठोस योजना ही नहीं है, तो इसका लाभ किसे और कब मिलेगा? 

उधर, राजस्थान के प्रमुख ब्राह्मण नेता और जनचेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अश्विनी तिवारी का कहना है कि- केन्द्र सरकार द्वारा सामान्य वर्ग के लिये आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था के द्वारा आठ लाख से कम आय वालों को आरक्षण का लाभ देने के जो इंतजाम किये गये हैं, वो आधे-अधूरे हैं, क्योंकि हर तरह के आरक्षण में क्रीमिलेयर व्यवस्था नहीं होने तक आरक्षण के वास्तविक और पात्र लोगों तक लाभ नहीं पहंुचेगा, केवल सामान्य, ओबीसी के मामले में क्रीमिलेयर की व्यवस्था क्यों है, जबकि यह सभी आरक्षण में होनी चाहिए। इसी तरह, एट्रोसिटी एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बहाल करने वाली व्यवस्था का केन्द्र सरकार द्वारा कानून नहीं लाने तक देश में समानता का संवैधानिक अधिकार सभी को नहीं मिल पायेगा, यह तय है। 

तिवारी का कहना है कि- लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सामान्य वर्ग को प्रभावित करने केन्द्र सरकार का यह कदम तभी सफल हो पाएगा जब क्रीमिलेयर व्यवस्था, एट्रोसिटी एक्ट संशोधन आदि पर भी न्याय संगत कदम उठाए जाएंगे। 

तिवारी ने कहा कि एक ही देश में आरक्षण को लेकर किसी में क्रीमिलेयर की व्यवस्था और किसी में क्रीमिलेयर को छोड देना कहां तक न्यायसंगत हैं? तिवारी का कहना था कि हाल ही संपन्न विधानसभा चुनावांे में हार के बाद केन्द्र सरकार को सामान्य वर्ग के गरीबों की याद क्यों आई, जबकि पिछले साढ़े चार साल में केन्द्र सरकार ने सामान्य वर्ग के हितों को लेकर कभी विचार नहीं किया। 

उल्लेखनीय है कि बाह्मण फेडरेशन के अध्यक्ष पं। भंवरलाल शर्मा के नेतृत्व में आर्थिक आधार पर आरक्षण का अभियान लंबे समय से चलाया जा रहा था। यही नहीं, फेडरेशन के पदाधिकारी भी समय-समय पर केन्द्र और प्रदेश की सरकारों के विभिन्न मंत्रियों को इस संबंध में ज्ञापन देते रहे हैं।

सियासी संकेत यही हैं कि जब तक नौकरियों की ठोस योजना नहीं बनती है तब तक नई आरक्षण व्यवस्था का कोई लाभ नहीं होना है। इसके अलावा, इस आरक्षण के लिए जो अधिकतम आय सीमा है, उसके अनुसार तो सामान्य वर्ग के ज्यादातर युवा इसके दायरे में आ जाएंगे, अर्थात।।। यह आरक्षण केवल दिखावटी होगा, आरक्षण का लाभ वास्तविक गरीबों को नहीं मिल पाएगा!

टॅग्स :सवर्ण आरक्षणआरक्षणमोदी सरकार
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