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भारत के 30 प्रतिशत से ज्यादा जिलों में जंगल में भीषण आग लगने का खतरा: सीईईडब्ल्यू

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 7, 2022 17:01 IST

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जलवायु में तेजी से होने वाले परिवर्तन के कारण आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र जंगल में भीषण आग लगने के लिहाज से सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।

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ठळक मुद्देबीते दो दशक में जंगल में आग लगने की घटनाएं 10 गुना बढ़ींबीते दो दशक में जंगल में आग लगने के 89 प्रतिशत मामले सूखे के जोखिम वाले जिलों में

नई दिल्ली: भारत के 30 प्रतिशत से ज्यादा जिलों में जंगल में भीषण आग लगने का खतरा मौजूद है। यह बात काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की ओर से आज जारी की गई रिपोर्ट ‘मैनेजिंग फॉरेस्ट फायर इन चेंजिंग क्लाइमेट’ में कही गई है। इस अध्ययन ने रेखांकित किया है कि पिछले दो दशकों के दौरान भारत में जंगल में आग की घटनाएं  10 गुना से ज्यादा बढ़ गई हैं। पिछले एक महीने में ही उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जंगल में आग लगने की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जलवायु में तेजी से होने वाले परिवर्तन के कारण आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र जंगल में भीषण आग लगने के लिहाज से सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) बढ़ा है, दुनिया भर में जंगल में भीषण आग लगने के मामले भी बढ़े हैं, खासकर शुष्क मौसम वाले क्षेत्रों में।

सीईईडब्ल्यू के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष ने कहा, “पिछले एक दशक में, पूरे देश में जंगल में आग लगने के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। इनमें से आग की कुछ घटनाओं का हमारे नाजुक पारिस्थितिक तंत्र (fragile ecosystems) और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। हमें जंगल में लगने वाली आग से होने वाले नुकसान को घटाने के लिए अपनी पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। जंगल में लगने वाली आग को रोकने के लिए राज्य और जिला स्तर पर सरकारी अधिकारियों को वन विभाग के अग्रिम पंक्ति के अधिकारियों और वनों पर आश्रित समुदायों की क्षमता को बढ़ाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। जंगल में लगने वाली आग के लिए सबसे ज्यादा जोखिम वाले इलाकों में, इसको नियंत्रित करने के लिए प्रभावी उपायों को अपनाने और ड्रोन का इस्तेमाल करने के बारे में प्रशिक्षण को बढ़ाना चाहिए, ताकि इससे होने वाले नुकसान और तबाही को सीमित किया जा सके। ”

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन ने आगे कहा है कि पिछले दो दशकों में, जंगल में लगने वाली आग के 89 प्रतिशत से ज्यादा मामले उन जिलों में दर्ज किए गए हैं, जो या तो लंबे समय से सूखे से प्रभावित हैं, या फिर वहां पर मौसम में अदला-बदली की प्रवृत्ति मौजूद है, यानी वहां पर बाढ़ की जगह पर सूखा या पहले से विपरीत मौसमी परिस्थितियां बन रही हैं। कंधमाल (ओडिशा), श्योपुर (मध्य प्रदेश), उधम सिंह नगर (उत्तराखंड), और पूर्वी गोदावरी (आंध्र प्रदेश), जंगल में आग लगने की अत्यधिक घटनाओं वाले कुछ ऐसे जिले हैं, जहां पर पहले बाढ़ आने का जोखिम होता था, लेकिन अब वहां सूखा पड़ने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

सीईईडल्यू के प्रोग्राम लीड और इस अध्ययन के मुख्य लेखक अबिनाश मोहंती ने कहा, “पिछले दो दशकों में जंगल में आग लगने की घटनाओं में हुई तेज बढ़ोतरी ने यह जरूरत पैदा की है कि हम जंगल की आग के प्रबंधन संबंधी अपनी सोच में महत्वपूर्ण तरीके से बदलाव करें। सरिस्का वन अभ्यारण्य की आग लगने की  हालिया घटना, एक सप्ताह में ऐसी चौथी घटना, दिखाती है कि जलवायु की बदली हुई परिस्थितियों में जंगल में लगने वाली आग का प्रबंधन क्यों अब राष्ट्रीय स्तर की एक अनिवार्यता बन गई है। इससे आगे बढ़ते हुए, हमें जंगल में लगने वाली आग को एक प्राकृतिक खतरे के रूप में स्वीकार करना चाहिए और इसकी रोकथाम संबंधी  गतिविधियों के लिए ज्यादा धनराशि आवंटित करनी चाहिए। वन भूमि पर जंगलों को दोबारा खड़ा करना और जंगल में आग का उचित तरीके से रोकथाम खाद्य प्रणालियों और पारंपरिक रूप से वनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका को सुरक्षित करने में मदद कर सकती है।”

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी पाया गया है कि जंगल में आग लगने के दौरान स्थानीय स्तर पर हवा की गुणवत्ता काफी खराब हो सकती है। राज्य सरकारों या राज्य के वन विभागों को सरकारी स्कूलों और सामुदायिक हॉल जैसे सार्वजनिक भवनों को नए उद्देश्यों के लिए तैयार करना चाहिए। इन भवनों में स्वच्छ हवा के लिए एयर फिल्टर जैसे उपाय लगाने चाहिए, ताकि जंगल में आग लगने के दौरान इन्हें आग और धुएं से सबसे ज्यादा प्रभावित समुदायों के लिए एक सुरक्षित आश्रय के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।

अंत में, इस अध्ययन ने सुझाव दिया है कि जंगल में आग लगने की घटनाओं को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (एनडीएमए) के तहत एक आपदा के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए। यह वन संबंधी राष्ट्रीय योजना को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।

एनडीएमए के तहत वित्तीय आवंटन में सुधार करते हुए प्रयासों को तेज करना चाहिए और जंगल में आग की रोकथाम और उससे लड़ने के लिए एक विशेष रूप से प्रशिक्षित कैडर (संवर्ग) तैयार करना चाहिए। इसके अलावा सरकारों को जंगल में आग लगने की घटनाओं के लिए रीयल-टाइम अलर्ट सिस्टम विकसित करने पर भी विचार करना चाहिए।

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