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कामुक इरादे से छोटे बच्चे को अपने गुप्तांगों को छूने के लिए मजबूर करना गंभीर यौन हमला?, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा- 4 साल की बच्ची के सामने प्राइवेट अंग दिखाना...

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 6, 2026 17:11 IST

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘कामुक इरादे से किसी छोटे बच्चे को गुप्तांग छूने के लिए मजबूर करना गंभीर यौन हमला है। इसलिए पोक्सो कानून अधिनियम की धारा 10 के तहत अपराध सिद्ध होता है।’’

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ठळक मुद्देप्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी के कारण को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।वह (अपीलकर्ता) पीड़िता के घर में किरायेदार था। यह अपराध 2022 में हुआ था।अपील में कोई दम नहीं है, लंबित आवेदनों (यदि कोई हों) के साथ खारिज किया जाता है।

नई दिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि कि कामुक इरादे से किसी छोटे बच्चे को अपने गुप्तांगों को छूने के लिए मजबूर करना बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) के तहत गंभीर यौन हमला है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने यह फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने लगभग चार साल की बच्ची के सामने अपने गुप्तांग को प्रदर्शित करने और उसे छूने के लिए मजबूर करने पर पोक्सो अधिनियम की धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत दोषी करार दिये जाने और सजा सुनाये जाने को चुनौती दी थी।

पोक्सो के तहत, बारह वर्ष से कम आयु के बच्चे पर यौन हमला करना गंभीर यौन हमले की श्रेणी में आता है। अपीलकर्ता को निचली अदालत ने जुलाई 2024 में दोषी ठहराया था और सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। वह (अपीलकर्ता) पीड़िता के घर में किरायेदार था। यह अपराध 2022 में हुआ था।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘कामुक इरादे से किसी छोटे बच्चे को गुप्तांग छूने के लिए मजबूर करना गंभीर यौन हमला है। इसलिए पोक्सो कानून अधिनियम की धारा 10 के तहत अपराध सिद्ध होता है।’’ उच्च न्यायालय ने पांच जनवरी को अपने फैसले में कहा, ‘‘अपील में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे लंबित आवेदनों (यदि कोई हों) के साथ खारिज किया जाता है।’’

उच्च न्यायालय ने आरोपी के इस दावे को खारिज कर दिया कि पीड़िता को सिखा-पढ़ा दिया गया है और उसके (आरोपी के) विरूद्ध अभियोजनयोग्य साक्ष्य नहीं है। उच्च न्यायालय ने कहा कि यौन उत्पीड़न का मूल आरोप पीड़िता के बयानों में लगातार बना रहा और अभिव्यक्ति में मामूली बदलावों से उसकी विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं पड़ता है।

उच्च न्यायालय ने आरोपी द्वारा अपने बचाव में प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी के कारण को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि देरी के कारण को पर्याप्त रूप से स्पष्ट कर दिया गया था और इसे अवरोधक नहीं माना जा सकता क्योंकि नाबालिग की मां के लिए पुलिस से संपर्क करने से पहले अपने पति के दूसरे शहर से लौटने का इंतजार करना ‘स्वाभाविक’ था।

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