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मैप की गलती, पहचान की सजा: आखिर क्यों सरकारी नक्शों में 'गाँव' बन गए 'स्लम'?, कागजी भूल या पहचान मिटाने की साजिश?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 10, 2026 10:30 IST

मानचित्रण (Mapping) के कारण इन विरासत क्षेत्रों को अनौपचारिक बस्तियों के रूप में चिन्हित कर दिया जाता है, जिससे निवासियों और प्रशासन के बीच विवाद की स्थिति पैदा होती है।

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ठळक मुद्देऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि यह इन समुदायों की सांस्कृतिक वैधता पर भी प्रहार है।आंकड़ों में समेटना उनकी स्थापत्य शैली और सामुदायिक संबंधों को नष्ट करने जैसा है।

मुंबईः आज हम जिस मुंबई को ऊँची इमारतों और चमचमाती सड़कों से जानते हैं, वह कभी ऐसी नहीं थी। इस शहर की असली शुरुआत यहाँ के छोटे-छोटे गाँवों (गाँवठाण) और मछुआरों की बस्तियों (कोलीवाड़ा) से हुई थी। लेकिन आज आधुनिकता की दौड़ में इन ऐतिहासिक जगहों पर खतरा मंडरा रहा है। इन समुदायों की कानूनी स्थिति और वर्तमान चुनौतियों पर आरकेएस एसोसिएट्स (RKS Associate) के एडवोकेट राकेश कुमार सिंह का कहना है कि "गाँवठाण और कोलीवाड़ा मुंबई के अतिक्रमण (Encroachment) नहीं, बल्कि इस शहर के मूल निवास स्थान हैं। झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) की योजनाओं के माध्यम से इन्हें 'स्लम' की श्रेणी में डालना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि यह इन समुदायों की सांस्कृतिक वैधता पर भी प्रहार है।

संवैधानिक और प्रशासनिक पेच

हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि गाँवठाण और कोलीवाड़ा क्षेत्रों में SRA योजनाएं लागू नहीं की जा सकतीं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। अक्सर त्रुटिपूर्ण मानचित्रण (Mapping) के कारण इन विरासत क्षेत्रों को अनौपचारिक बस्तियों के रूप में चिन्हित कर दिया जाता है, जिससे निवासियों और प्रशासन के बीच विवाद की स्थिति पैदा होती है।

एडवोकेट राकेश कुमार सिंह इस विसंगति पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहते हैं:

"प्रशासनिक खामियों और गलत मैपिंग के कारण जब एक ऐतिहासिक गाँवठाण को गलती से 'स्लम' घोषित कर दिया जाता है, तो यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को मिटाने की शुरुआत होती है। पुनर्विकास के नाम पर इन क्षेत्रों को महज आंकड़ों में समेटना उनकी स्थापत्य शैली और सामुदायिक संबंधों को नष्ट करने जैसा है।"

पुनर्विकास की नई परिभाषा की मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्ध्वाधर (Vertical) विकास हर समस्या का समाधान नहीं है। कोलीवाड़ों की सामाजिक और आर्थिक संरचना उनके खुले स्थानों और पारंपरिक बनावट से जुड़ी है।

इस मुद्दे पर समावेशी दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए सिंह कहते हैं: "हमें मानकीकृत हाई-राइज़ पुनर्वास के बजाय एक 'कैलिब्रेटेड पॉलिसी फ्रेमवर्क' की आवश्यकता है। बुनियादी ढांचे का विकास ऐसा हो जो उनकी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करे। विशेष हेरिटेज ज़ोनिंग और कानूनी मान्यता ही वह रास्ता है जिससे हम आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक अस्तित्व के बीच संतुलन बना सकते हैं।

मुंबई अपनी विविधता के लिए जानी जाती है। अगर यहाँ के गाँवठाण और कोलीवाड़ा खत्म हो गए, तो मुंबई अपनी रूह खो देगी। जैसा कि एडवोकेट सिंह कहते हैं, इन इलाकों को बचाना सिर्फ पुरानी यादों का मामला नहीं है, बल्कि यह अपने इतिहास का सम्मान करते हुए भविष्य की ओर बढ़ने का सही तरीका है।

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