कोई चमत्कारी महाराष्ट्र को भी मिले

By Amitabh Shrivastava | Updated: May 9, 2026 07:25 IST2026-05-09T07:24:59+5:302026-05-09T07:25:03+5:30

जिस प्रकार दक्षिण के नेताओं ने उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और जातिगत समीकरणों से ऊपर अपनी छवि बनाई, उस प्रकार की संरचना को तैयार करने में महाराष्ट्र के सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र के नेता विफल रहे.

Maharashtra should also get some miracle | कोई चमत्कारी महाराष्ट्र को भी मिले

कोई चमत्कारी महाराष्ट्र को भी मिले

यह सिर्फ दो साल पुरानी कहानी है, जिसमें दक्षिण भारत के एक और कलाकार ने अपनी लोकप्रियता भुनाते हुए तमिलनाडु की सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे दी है. चंद्रशेखरन जोसेफ विजय यानी थलापति विजय, जिनके बारे में एग्जिट पोल तक सही भविष्यवाणी नहीं कर सके और उन्होंने तमिल जनता का राजनीतिक ‘हीरो’ बनने में भी सफलता पा ली.

माना यह जाता है कि उनके मन में राजनीति के प्रति उस समय से रुझान था, जब उन्होंने एक ‘फैन क्लब’ बनाया था और बाद में स्थानीय निकायों का चुनाव लड़ा था. यही नहीं, एआईएडीएमके को चुनाव में सहायता भी की थी. किंतु स्वतंत्र दल बनाकर दो साल की  तैयारी में 108 सीटें जीतना कोई मामूली बात नहीं है. वह भी तब जब राज्य की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ कोई वातावरण नहीं बना और उसकी वापसी तय मानी जा रही हो.

अब सवाल यही है कि यदि उत्तर से दक्षिण के अनेक राज्यों में कोई एक करिश्माई नेता अपनी ताकत से सत्ता बदल देता है तो महाराष्ट्र में कोई शक्तिमान क्यों नहीं तैयार हो पाया. 66 साल के इतिहास में एक दर्जन नेता उभरे और सामने आए, लेकिन सत्ता समझौते से ही मिली. ग्लैमर की दुनिया में सितारे सबसे अधिक महाराष्ट्र में ही थे, किंतु उन्होंने प्रचार से अधिक कभी कोई सामाजिक अथवा राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं निभाई.

महाराष्ट्र, जहां बॉलीवुड से लेकर क्रिकेट की दुनिया का मुख्यालय ‘बीसीसीआई’ तक है. राज्य में भारत रत्नों की संख्या सबसे अधिक है. इस परिक्षेत्र में सबसे ज्यादा सामाजिक जागरुकता के आंदोलन हुए और स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख केंद्रों में से एक यही राज्य था. फिर भी राजनीति के स्तर पर कोई करिश्माई नेता इतना बड़ा कद नहीं बना सका, जिसके नाम पर सत्ता का शिखर पाया जा सका हो.

दक्षिण में अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियां, उत्तर में सामाजिक आंदोलनों से जुड़े नेता सत्ता को पाने में सफल हुए हैं. यह बात और है कि उन्हें अधिक अवसर नहीं मिले, किंतु एक मौका तो हर एक को मिला. महाराष्ट्र के गठन के बाद कांग्रेस का बोलबाला रहा, लेकिन जब अवसर आया तो समझौतावादी राजनीति को अपनाया गया. राज्य में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) के नेता शरद पवार, शेतकरी कामगार पक्ष के नेता शरद जोशी, समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडीस, मधु लिमये, शिवसेना के बालासाहब ठाकरे, वर्तमान में वंचित बहुजन मोर्चे के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे जैसे अनेक नेताओं ने अपने उदय के साथ अपना एक समय बनाया, जिसमें उनका प्रभाव और लोकप्रियता चरम पर थी.

किंतु उससे उन्हें सत्ता की सीढ़ी नहीं मिली. कहीं गठबंधन और समझौता करना ही एक मजबूरी के रूप में सामने आया.

दक्षिण की तरह ही महाराष्ट्र कला और खेल दोनों में अग्रणी स्थान पर रहा. राज्य में हिंदी के साथ मराठी फिल्मों का प्रभाव रहा. उनके कलाकारों की सामाजिक चेतना हमेशा ही प्रबल रही. किंतु उसका लाभ राजनीतिक परिवर्तन के रूप में नहीं हुआ. वह प्रचार और समर्थन के लिए उपयोग में लाए जाते रहे, लेकिन जनप्रतिनिधि बनने का न किसी कलाकार में साहस दिखा और न ही उन्हें आजमाने की किसी राजनीतिक दल ने कोशिश की.

बॉलीवुड के अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, सनी देओल, स्मृति ईरानी, कंगना रनौत तक राजनीति में आए, लेकिन हेमा मालिनी और स्मृति ईरानी को छोड़ कर सभी अपने गृह राज्य से ही चुनाव मैदान में उतरे और वहीं सीमित रहे.

केंद्र सरकार ने अनेक कलाकारों और खिलाड़ियों को राज्यसभा के लिए नामित किया, मगर उन्होंने उसमें कोई रुचि नहीं दिखाई. बस छह साल का समय काट लिया. विधानसभा के दृष्टिकोण से भी न हिंदी और न मराठी कलाकार जनप्रतिनिधि बनने के लिए सामने आया. मराठी टीवी कलाकार अमोल कोल्हे ने संसदीय चुनाव लड़ा और राकांपा के सांसद बने रहे. स्पष्ट यही रहा कि दक्षिण की तरह किसी कलाकार ने अपना दल बनाकर और स्थापित नेताओं को हराकर कभी विजय प्राप्त नहीं की. न ही राजनीतिक संभावना को जन्म दिया. संभव है कि इसकी वजह आत्मविश्वास में कमी रही हो या फिर राजनीतिक दलों का दबाव रहा हो. किंतु महत्वाकांक्षा को भी कोई स्थान नहीं मिला.

यह कहा जा सकता है कि राज्य में राजनीति जातिगत समीकरण में काफी उलझी हुई है और कला क्षेत्र में हमेशा ही जाति विशेष का दबदबा रहा है. उससे बाहर निकलने का प्रयास नहीं हुआ. जिस प्रकार दक्षिण के नेताओं ने उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और जातिगत समीकरणों से ऊपर अपनी छवि बनाई, उस प्रकार की संरचना को तैयार करने में महाराष्ट्र के सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र के नेता विफल रहे.

वे हमेशा ही एकतरफ बंध कर रह गए. राज्य के नए और उभरते नेताओं ने अपनी शुरुआत तो बहुत आक्रामक की, लेकिन जनमानस को जीतने में असफल रहे. या चुनावी गणित में जनता को जोड़ पाने में उन्हें सफलता नहीं मिली. इसी कारण राज्य में कोई थलापति अकेले विजय हासिल नहीं कर पा रहा है. दूसरे शब्दों में, कोई भी जनता का ‘हीरो’ अपनी व्यापक या सर्वमान्य छवि बनाने में विफल है.

उलझे हुए समीकरणों में राजनीति के पैंतरों में उलझना ही जनसामान्य के लिए एकमात्र विकल्प है. हालांकि यही वह राज्य है, जहां स्वराज से लेकर दलित चेतना, महिला उत्थान को लेकर और अंधविश्वास के खिलाफ जमकर संघर्ष हुआ. समाज को शिक्षा से लेकर आर्थिक सामर्थ्य के अनेक पाठ पढ़ाए गए. मगर उनसे राजनीतिक चेतना नहीं बदली. किसी सीमा तक उसे बदला या फिर ध्रुवीकृत रहने दिया गया.

कुछ नेताओं के प्रयास में कमी और इच्छाशक्ति का भी अभाव रहा. फिलहाल व्यक्ति केंद्रित राजनीति का दक्षिण में लंबा इतिहास है, लेकिन खिचड़ी राजनीति से ऊपर इधर-उधर भटकता महाराष्ट्र भी किसी चमत्कारी नेता को देखना चाहता है, जो उसका कल्याण ईमानदारी से कर सके.  

Web Title: Maharashtra should also get some miracle

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