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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉगः इजराइल में नेतन्याहू का पुनरोदय

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: November 8, 2022 10:01 IST

जब 1948 में इजराइल का जन्म हुआ था, तब जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका आदि कई देशों के गोरे यहूदी लोग वहां आकर बस गए थे। उन्हीं में से एक का बेटा जो 1949 में जन्मा था, अब इजराइल का ऐसा प्रधानमंत्री है, जिससे ज्यादा लंबे काल तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा। 

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इजराल में जितनी फुर्ती से सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं, दुनिया के किसी अन्य लोकतंत्र में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलते। बेंजामिन नेतन्याहू लगभग डेढ़ साल बाद फिर दुबारा प्रधानमंत्री बन गए। उनका यह पुनरोदय असाधारण है। वे इजराइल के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो वहीं पैदा हुए हैं। उनसे पहले जो भी प्रधानमंत्री बने हैं, वे बाहर के किन्हीं देशों से आए हुए थे। जब 1948 में इजराइल का जन्म हुआ था, तब जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका आदि कई देशों के गोरे यहूदी लोग वहां आकर बस गए थे। उन्हीं में से एक का बेटा जो 1949 में जन्मा था, अब इजराइल का ऐसा प्रधानमंत्री है, जिससे ज्यादा लंबे काल तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा। 

47 साल की उम्र में इजराइल के प्रधानमंत्री बनने वाले वे सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। वे कई बार हारे और जीते। उन्हें दक्षिणपंथी माना जाता है। वे फौज के सिपाही होने के नाते 1967 के अरब-इजराइल युद्ध में अपनी बहादुरी दिखा चुके थे। यह वह वक्त था, जब इजराइल ने डंडे के जोर पर सीरिया से गोलान की पहाड़ियां, जॉर्डन का पश्चिमी किनारा, गाजा पट्टी और पूर्वी यरूशलम पर कब्जा कर लिया था। उस आक्रामक संस्कार से मंडित नेतन्याहू ने जब इजराइली राजनीति में प्रवेश किया तो वे अरब-विरोधियों के प्रवक्ता बन गए। नरमपंथी प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की हत्या के बाद 1996 में हुए चुनाव में इजराइल की जनता ने घनघोर अरब-विरोधी नेतन्याहू को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया।

अब इजराइल के मिस्र, सऊदी अरब, जॉर्डन, यूएई, बहरीन, मोरक्को, सूडान आदि राष्ट्रों से भी ठीकठाक संबंध बन गए हैं। भारत और रूस के साथ भी इजराइल के संबंध पहले से बेहतर बनाने में नेतन्याहू का विशेष योगदान है। उन्हीं के प्रयत्न के फलस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल गए थे और वे खुद दो बार भारत आ चुके हैं।

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