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ब्लॉग: इमरान खान की कुर्सी जब खतरे में है तो वे भारत के कसीदे क्यों पढ़ रहे हैं?

By राजेश बादल | Updated: March 22, 2022 11:26 IST

इमरान खान को डर है कि यदि विपक्ष ने सत्ता में आने पर उनके भ्रष्टाचार के मुकदमों की फाइल खोल दी और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा तो कौन शरण देगा?

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इमरान खान को अब समझ में आया. जब उनकी सत्ता का संध्याकाल आ गया तो आंखें खुलीं. मलकान रैली में वे भारतीय विदेश नीति पर लट्टू दिखाई दिए. पाक के प्रधानमंत्री ने माना कि हिंदुस्तान की स्वतंत्र विदेश नीति शानदार है. वह एक तरफ क्वाड में अमेरिका का साथी है, तो दूसरी तरफ रूस का भरोसेमंद रणनीतिक साझीदार है. अमेरिका की बंदिशों के बाद भी वह धड़ल्ले से रूस का तेल खरीद रहा है. वे दोहराते हैं कि इंडिया की विदेश नीति उसके अपने लोगों की भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है(यहां हम भारत की विदेश नीति के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं). 

हालांकि यहां एक सवाल इमरान खान से भी बनता है कि क्या उनके इस कथन में कोई मजबूरी छिपी है? उन्हें अपने देश की स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करने से कौन रोक रहा है. क्यों वे अपने नागरिकों की भलाई करने वाली विदेश नीति आज तक नहीं बना सके. जहां तक क्वाड की बात है तो एक बार फिर इमरान के अंतरराष्ट्रीय ज्ञान की पोल खुल गई है. क्वाड का गठन आपदा राहत और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शांति के मकसद से किया गया था. चीन के इरादों पर नजर रखना भी इसका उद्देश्य था. लेकिन कहीं भी रूस से मुकाबला करने की बात इन देशों के संगठन में नहीं है और न ही एक-दूसरे के कारोबारी हितों में दखल देने की मंशा है.

तो फिर इमरान खान ने भारत के कसीदे क्यों पढ़े. इसका उत्तर मैं अपने नजरिये से देना चाहूंगा. इमरान खान नियाजी फौज के कठपुतली प्रधानमंत्री हैं. इमरान की पार्टी सेना की मेहरबानी से हुकूमत में आई थी. सेना ने अनेक धांधलियां कर उन्हें प्रधानमंत्री बनवाया था. उस समय उनका सियासी कद नाटा था और वे वैचारिक रूप से दुर्बल थे. जब तक रीढ़विहीन निर्बल इमरान खान सियासत में सैनिक बैसाखियों पर जीवित रहा, उसने हकीकत से आंखें मूंद कर रखीं. न उसे अवाम के हित दिखाई दिए और न राष्ट्र के. 

अब खबरें मिल रही हैं कि फौज ने पद छोड़ने के लिए कह दिया है तो इमरान खान की संवेदनाओं के सारे बिंदु जाग उठे हैं. विपक्ष ने नाक में दम कर दिया है. उसका अविश्वास प्रस्ताव प्रधानमंत्री की घबराहट का सबब है, क्योंकि समर्थन दे रहे सांसद ही उनसे किनारा करने लगे हैं. उनकी सरकार के पास केवल 7 सांसद बहुमत के बिंदु 172 से अतिरिक्त हैं. 

इनमें से 24 सांसद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की यानी बिलावल भुट्टो जरदारी की मेहमानी का आनंद ले रहे हैं. वे मीडिया के सामने ऐलान कर चुके हैं कि इमरान सरकार को उनका समर्थन अब नहीं है. इसके अलावा प्रतिपक्षी मोर्चे के संयोजक मौलाना रहमान का दावा है कि पांच सांसद उनके साथ आ चुके हैं. यानी इमरान खान की पार्टी अल्पमत में आ गई है. इस तरह तकनीकी तौर पर अविश्वास प्रस्ताव की भी जरूरत नहीं रही.  

ऐसे में इमरान खान को डर है कि यदि विपक्ष ने सत्ता में आने पर उनके भ्रष्टाचार के मुकदमों की फाइल खोल दी और उन्हें नवाज शरीफ की तरह देश छोड़कर भागना पड़ा तो कौन उन्हें शरण देगा? इमरान ऊटपटांग बयानों से अमेरिका और पश्चिमी देशों को नाराज कर चुके हैं, यूरोप के देशों पर सवाल उठा चुके हैं. मौजूदा स्थितियों में रूस और चीन उन्हें शरण देने की सोचेंगे भी नहीं. 

वैसे भी चीन के राष्ट्रपति पुरानी बातें नहीं भूलते. शी जिनपिंग को याद होगा कि इमरान खान एक बार उनकी पाकिस्तान यात्रा के विरोध में धरने पर बैठ गए थे. शी जिनपिंग को इस कारण यात्रा रद्द करनी पड़ी थी. ले-देकर हिंदुस्तान ही बचता है. शायद यहां उन्हें शरण मिल जाए. इसीलिए वे अपने भाषण में विरोधाभासी बिंदुओं के बीच संतुलन खोजने के लिए भारत की तारीफ करते हैं. एक-दो बार पहले भी वे भारत की प्रशंसा कर चुके हैं. कहा जाता है कि भारत में उन्होंने कुछ गुप्त निवेश भी किया है. 

कहावत सही है कि जब इंसान बेहद अकेला होता है अथवा उसका अंत समय आता है तो उसके सारे ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं. उसे जिंदगी का सच पता चल जाता है. यदि इस सच का अहसास पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कुर्सी संभालते ही कर लेते तो संभवतया अब तक कश्मीर समेत दोनों मुल्कों के बीच सारी समस्याओं का समाधान भी खोज लेते. लेकिन इस पड़ोसी मुल्क के हर वजीरे आजम का हाल ऐसा ही रहा है. 

मन ही मन उसे भारत से बेहतर रिश्ते बनाने की ख्वाहिश रही है, लेकिन वह फौज को नाराज नहीं कर पाता क्योंकि उसी की मेहरबानी से प्रधानमंत्री बनता है और पाकिस्तानी फौज का अस्तित्व भारत से नफरत और दुश्मनी की बुनियाद पर ही टिका है. अन्यथा वहां की अवाम तो आज भी हिंदुस्तान से भाईचारा चाहती है.

भले ही इमरान अपने स्वार्थ की खातिर भारत की तारीफ करने पर विवश हुए हों, लेकिन सच है कि पाकिस्तान ने कश्मीर के लिए दुनिया भर के दरवाजों पर नाक रगड़ी है. विभाजन के बाद पाकिस्तान ने कुछ बरस पश्चिम एशिया के इस्लामी देशों और राष्ट्रमंडल देशों के दर पर कश्मीर की भीख मांगी. फिर 1954 के बाद आठ साल वह अमेरिका से कश्मीर की गुहार लगाता रहा. नाकाम रहा तो चीन और इंडोनेशिया की शरण में गया. इसके बाद 1964 में रूस के द्वार जा पहुंचा. फिर अमेरिका की गोद में जा बैठा, लेकिन अमेरिका उसे झुनझुना दिखाता रहा. 

इसके बाद पाकिस्तान फिर चीन और इस्लामी देशों की शरण में है. अर्थात जहां से सफर शुरू किया था, उसी बिंदु पर पाकिस्तान खड़ा है. कह सकते हैं कि ऐसा कोई गठबंधन नहीं बचा, जिसके द्वार पाकिस्तान न गया हो. वह उस देश से दोस्ती क्यों नहीं करता, जिसकी दुश्मनी की खातिर उसे दर-दर भटकना पड़ रहा है. क्या पाकिस्तान अब असली सबक सीख रहा है?

 

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