Iran Protest: इस्लामिक गणराज्य ईरान में ताजी हवा की चाहत रखने वालों के मन में असंतोष की आग तो बड़े लंबे समय से जल रही थी लेकिन ये आग अचानक कैसे भड़क गई? क्या इस जनविद्रोह के मूल में केवल महंगाई और बेरोजगारी का मसला है? या फिर मानवाधिकारों या महिलाओं की आजादी को फौजी बूटों तले रौंदने वाली खामनेई सरकार को उखाड़ फेंकने की बड़ी योजना है?
जिस तरह से प्रदर्शन हो रहे हैं, आगजनी हो रही है, पुलिस थानों पर हमले हो रहे हैं और प्रदर्शनकारियों ने सैन्य अड्डों में घुसने की कोशिश की है, वह दर्शाता है कि यह जनविद्रोह कितना प्रबल है! हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है और पुलिस की गोलियों से कई प्रदर्शनकारी मारे भी गए हैं. मशहद शहर से शुरू हुई आग पूरे ईरान में फैल चुकी है.
2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद यह पहला मौका है जब जनआक्रोश ने सत्ता को सीधी चुनौती दी है. इस बीच गौर करिए कि प्रदर्शनकारी क्या नारे लगा रहे हैं? वे सरकार की बर्खास्तगी की मांग तो कर ही रहे हैं, विदेश नीति की आलोचना भी कर रहे हैं और सरकार को अपने चंगुल में रखने वाले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई की मौत के भी नारे लगा रहे हैं.
ये वही खामनेई हैं जो बार-बार अमेरिका को चेतावनी देते रहते हैं. तो, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बयान पर भी गौर करिए. ट्रम्प कह रहे हैं- महान ईरानी लोगों को कई वर्षों से दबाया गया है. वहां के लोग भोजन और स्वतंत्रता के भूखे हैं. मानवाधिकारों के साथ ही ईरान की संपत्तियां लूटी जा रही हैं. बदलाव का समय आ गया है.
ठीक ऐसा ही सुर ईरान के पूर्व शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी के पुत्र शाह रेजा पहलवी ने भी मिलाया है. रेजा ने कहा है कि मौजूदा इस्लामी गणराज्य ढह रहा है और अपने मूल ईरान को हासिल करने का समय आ गया है. रेजा पहलवी जनता से सड़कों पर उतरकर राष्ट्रीय क्रांति में भाग लेने का आह्वान लगातार कर रहे हैं.
यहां यह जानना जरूरी हैै कि अमेरिका में रह रहे शाह रेजा की महत्ता क्या है? और उनके पिता शाह मोहम्मद रजा पहलवी को ईरान की सत्ता कैसे मिली थी. 1951 में नेशनल फ्रंट के उम्मीदवार और पेशे से वकील मोसद्देक लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए और प्रधानमंत्री बने. वे बड़े साहसी नेता थे. उस समय ईरान का तेल उद्योग ब्रिटेन की कंपनियां नियंत्रित करती थीं और सारा मुनाफा खा जाती थीं.
मोसद्देक ने साहसिक फैसला लिया और तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. पश्चिमी ताकतों का खफा होना लाजमी था. ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई 6 और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ऐसी चाल चली कि 1953 में ईरान में तख्तापलट हो गया और पश्चिमी ताकतों ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी जिनका खानदान पहले शासन में था.
शाह ने ईरानी तेल का बड़ा हिस्सा अमेरिकी कंपनियों को दे दिया. और यह सब कोई कही-सुनी बातें नहीं हैं. खुद सीआईए ने 2013 में अधिकृत तौर पर स्वीकार किया था कि 1953 के तख्तापलट में उसकी भूमिका थी. वैसे यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि शाह के जमाने में ईरान ने खूब तरक्की की. उन्होंने देश को आधुनिकता की राह पर काफी आगे बढ़ाया.
महिलाओं को पूरी आजादी दी. ईरान में बिल्कुल यूरोप जैसी स्थिति थी. मगर कट्टरपंथियों सहित सोवियत यूनियन जैसी ताकतों को ईरान का अमेरिका की गोद में चले जाना रास नहीं आ रहा था. 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हो गई. पहलवी शासन का तो अंत हुआ ही, ईरानी छात्रों के एक समूह ने 4 नवंबर 1979 को अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया.
इस समूह ने 444 दिनों तक 52 अमेरिकियों को बंधक बनाए रखा. महाशक्ति अमेरिका के लिए यह घनघोर अपमान का विषय बन गया. सत्ता में आए अयातुल्लाह खुमैनी ने अमेरिका के खिलाफ बिगुल बजा दिया. तब से अमेरिका और ईरान के रिश्तों में जो खटास पैदा हुई वह अब तक चली आ रही है. मौजूदा सर्वोच्च नेता खामनेई उसी राह पर चल रहे हैं जिस राह पर खुमैनी थे.
ईरान परमाणु बम बनाने के बहुत करीब पहुंच चुका है और उसे इससे दूर रखने के लिए पश्चिमी ताकतें कुछ भी कर सकती हैं. ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिकों को इजराइल मौत के घाट उतार चुका है. अमेरिका ने पिछले साल ही ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था.
इसके बावजूद मौजूदा सत्ता बम बनाने पर अडिग है तो महाशक्तियों को स्थाई इलाज यही नजर आ रहा है कि खामनेई की सत्ता को ही नेस्तनाबूद कर दिया जाए. ध्यान रखिए कि किसी राष्ट्र के भीतर यदि असंतोष है तो उसे कूटनीतिक हथियार बना लेने की पुरानी परंपरा रही है. संभव है मौजूदा जनविद्रोह के पीछे ये फैक्टर भी काम कर रहा हो!
इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरान में अमेरिका, ब्रिटेन, इजराइल और रूस सहित कई ताकतों की अपनी-अपनी फितरत है. फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि खामनेई फ्रंट फुट पर खेलते हैं या बैकफुट पर! और सवाल यह भी है कि क्या उनका स्टंप सुरक्षित रह पाएगा?
चलते चलते....
जिस इंदौर के ललाट पर देश का सबसे साफ-सुथरा शहर होने का तिलक लगा हो, उस शहर में प्रदूषित पानी से दर्जन भर लोगों की मौत से बेहद आहत हूं. और उससे भी ज्यादा आहत इस बात से हूं कि सिस्टम इतना लापरवाह कैसे हो सकता है कि नल से प्रदूषित पानी लोगों के घर में पहुंच जाए? और उसके बाद जिम्मेदार नेतृत्व जो शर्मनाक भाषा बोल रहा वह तो और भी आहत करने वाला है. क्या जिंदगी का कोई मोल नहीं?