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एआई: तकनीकी प्रगति या पर्यावरणीय संकट? 

By ऋषभ मिश्रा | Updated: March 9, 2026 07:13 IST

एआई की पर्यावरणीय जिम्मेदारी चुनौतीपूर्ण है और अगर हम समय रहते न समझे तो यह तकनीक हमारे जलवायु लक्ष्यों पर भी गंभीर दबाव डालेगी.

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आज ‘एआई’ यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द सुनते ही आमतौर पर तकनीकी प्रगति, स्मार्ट सेवाएं और डिजिटल क्रांति की बातें जुड़ी नजर आती हैं. पर सच यह है कि जिस तकनीक को हम भविष्य का पर्यावरण समर्थक-समाधान मानते हैं, वही आज ऊर्जा खपत, पानी की खपत और कार्बन उत्सर्जन के मामले में एक नई समस्या बनकर उभर रही है. एआई की पर्यावरणीय जिम्मेदारी चुनौतीपूर्ण है और अगर हम समय रहते न समझे तो यह तकनीक हमारे जलवायु लक्ष्यों पर भी गंभीर दबाव डालेगी.

एआई सिस्टम विशेषकर बड़े भाषा मॉडल और जनरेटिव एआई सिस्टम अत्यधिक कम्प्यूटेशनल पाॅवर मांगते हैं. यह कम्प्यूटेशनल पाॅवर सीधे बिजली की खपत में बदलती है. वैश्विक स्तर पर 2026 तक एआई और डेटा सेंटर्स का कुल मिलाकर लगभग 450-500 टेरावाट घंटे ऊर्जा खपत करने का अनुमान है. जो लगभग 2 फीसदी वैश्विक बिजली खपत के बराबर है. 2030 तक यह 945 टेरावाट घंटे से अधिक पहुंच सकता है.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल के कारण डेटा सेंटर्स की ऊर्जा जरूरत तेजी से बढ़ेगी. अगर एआई का विस्तार इसी रफ्तार से हुआ तो डेटा सेंटर्स का ऊर्जा उपयोग जापान जैसे देशों की कुल बिजली खपत के स्तर तक पहुंच सकता है. इन आंकड़ों को वास्तविक दुनिया के उदाहरणों से जोड़ा जाए तो पता चलता है कि आज के एआई वर्कलोड (जैसे मॉडल ट्रेनिंग और इनफरेंस) के लिए जो बिजली चाहिए वह कुछ देशों की कुल बिजली खपत के बराबर है और यह जरुरत भविष्य में और बड़े पैमाने पर होने वाली है.

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि बड़ी तकनीकी कंपनियों का अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन 2020-2023 में 150 फीसदी तक बढ़ गया है, जिसका मुख्य कारण डेटा सेंटर्स का ऊर्जा विस्तार है. डेटा सेंटर्स में सर्वर जब भारी काम करते हैं तो वे गर्म हो जाते हैं, गर्मी को नियंत्रित करने के लिए कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें काफी मात्रा में पानी की खपत होती है.

2025 में डेटा सेंटर्स की कुल पानी खपत 300 से 700 अरब लीटर के बीच होने का अनुमान है, जो कुछ देशों के सालाना पानी उपयोग के बराबर है. चैटजीपीटी जैसे एआई सिस्टम के हर एक ‘क्वेरी’ के लिए लगभग 0.32 मिली लीटर पानी लगता है. और इसकी कूलिंग के लिए भी लगभग इतने ही लीटर पानी की जरूरत होती है.

यदि हम एआई का उपयोग व्यापक रूप से जारी रखते हैं, तो यह पानी की खपत एक गुप्त मगर बड़ी जल संकट संबंधित समस्या बन सकती है. खासकर उन इलाकों में जहां पानी की कमी पहले से ही एक चुनौती है. एआई के बढ़ते उपयोग का सबसे चर्चित असर है, कार्बन उत्सर्जन.

आंकड़ों के अनुसार एआई सम्पर्की सिस्टमों द्वारा वार्षिक कार्बन मोनो ऑक्साइड उत्सर्जन लगभग 105 मिलियन मीट्रिक टन हो चुका है, जो कि कुछ देशों के उत्सर्जन के बराबर है. कुछ विश्लेषणों के अनुसार एआई और डेटा सेंटर 2.5 फीसदी से 3.7 फीसदी तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का हिस्सा हो सकते हैं, जो तेजी से बढ़ रहा है.

टॅग्स :आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसTechnology Development BoardEnvironment Ministry
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