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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: मोदी सरकार का नया 'कानून' दिल्ली की जनता का अपमान है!

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: March 17, 2021 09:07 IST

दिल्ली में अब हर नए कानून के लिए यहां की सरकार को उपराज्यपाल से सहमति लेनी होगी. केंद्र सरकार अब ऐसा कानून बनाने जा रही है. निश्चित तौर पर ये दिल्ली की जनता के लिए अपमान की तरह है.

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ठळक मुद्दे'दिल्ली के लिए केंद्र का नया प्रस्तावित कानून ब्रिटिश राज की तरह है''खुद को राष्ट्रवादी पार्टी कहनेवाली भाजपा यह अराष्ट्रीय काम क्यों कर रही है, समझ में नहीं आता'

केंद्र सरकार अब ऐसा कानून बनाने पर उतारू हो गई है, जो दिल्ली की केजरीवाल-सरकार को गूंगा और बहरा बनाकर ही छोड़ेगा. दिल्ली की यह सरकार अब आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं कहलाएगी. वह होगी, उपराज्यपाल की सरकार यानी दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय के द्वारा नियुक्त अफसर की सरकार. 

दिल्ली की जनता का इससे बड़ा अपमान क्या होगा? यह तो वैसा ही हुआ, जैसा कि ब्रिटिश राज में होता था. लंदन में थोपे गए वायसराय को ही सरकार माना जाता था और तथाकथित मंत्रिमंडल तो सिर्फ हाथी के दांत की तरह होता था.

अपने आपको राष्ट्रवादी पार्टी कहनेवाली भाजपा यह अराष्ट्रीय काम क्यों कर रही है, समझ में नहीं आता. उसके दिल में यह डर तो नहीं बैठ गया है कि अरविंद केजरीवाल कहीं उसके लिए चुनौती न बन जाएं. सारे विपक्षी मुख्यमंत्रियों में केजरीवाल इस समय सबसे अधिक चर्चित और प्रशंसित नेता हैं. 

दिल्ली प्रांत छोटा है, केंद्र-प्रशासित क्षेत्र है, फिर भी दिल्ली दिल्ली है. इसके मुख्यमंत्री को देश में ज्यादा प्रचार मिलता है. केजरीवाल ने हाल ही में हुए उपचुनाव और स्थानीय चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन किया है. 

केजरीवाल की बढ़ती हुई लोकप्रियता से घबराकर केंद्र सरकार यह जो नया कानून ला रही है, वह भाजपा की प्रतिष्ठा को धूमिल कर देगा. पुडुचेरी में किरण बेदी और दिल्ली में उपराज्यपालों ने स्थानीय सरकारों के साथ जैसा बर्ताव किया है, वह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अशोभनीय है. 

अब तक दिल्ली की विधानसभा सिर्फ तीन मामलों में कानून नहीं बना सकती थी- पुलिस, शांति-व्यवस्था और भूमि. लेकिन अब हर कानून के लिए उसे उपराज्यपाल से सहमति लेनी होगी. उपराज्यपाल किसी भी विधेयक को कानून बनने से रोक सकते हैं.

इस नए विधेयक को लादते हुए केंद्र ने यह भी कहा है कि ये सब प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के 4 जुलाई 2018 के निर्णय के अनुसार ही किए गए हैं. लेकिन यदि आप संविधान पीठ के उस निर्णय को पढ़ें तो आपको उन अफसरों की बुद्धि पर तरस आने लगेगा, जिन्होंने यह विधेयक तैयार किया है और गृह मंत्री को पकड़ा दिया है. 

यह विधेयक उस फैसले का सरासर उल्लंघन है. हो सकता है कि इस अविवेकपूर्ण विधेयक को लोकसभा पारित कर दे और इस पर समुचित बहस भी न हो लेकिन सर्वोच्च न्यायालय इसे रद्द किए बिना नहीं रहेगा. इसके अलावा सबसे बड़ी अदालत तो जनता की होती है. दिल्ली की जनता की अदालत में भाजपा ने खुद को दंडित करवाने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है.

टॅग्स :नरेंद्र मोदीदिल्लीअरविंद केजरीवालअमित शाहभारतीय जनता पार्टी
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