अमेरिकी लोकतंत्र के शीर्ष नेतृत्व की इन बेबाक प्राथमिकताओं के मुकाबले अगर हम भारत में चल रही आर्थिक बहस पर नजर डालें तो पता चलता है कि हमारे नेतृत्व की प्राथमिकताएं कुछ अलग तरह की हैं.
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वर्तमान सरकार ने इन पदों को भरने में थोड़ी मुस्तैदी इधर जरूर दिखाई है लेकिन जरूरी यह है कि वह पत्तों पर पानी छिड़कने की बजाय जड़ों में लगे कीड़ों का इलाज करे। विधि आयोग का कहना है कि भारत में अभी लगभग 20 हजार जज हैं।
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सबसे पहले तो यह मानकर चलना होगा कि कोरोना जैसी बीमारी आई है तो अचानक जाएगी नहीं. हम भले पहली लहर, दूसरी लहर या संभावित तीसरी लहर की बात करें, सच यही है कि कोरोना पूरी तरह गया ही नहीं.
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भारत की विदेश नीति के नजरिये से देखें तो बीते सात-आठ साल चिंता में डालने वाले रहे हैं. आमतौर पर सत्ता परिवर्तन के साथ कभी भी हिंदुस्तान की विदेश नीति में कोई बड़ी तब्दीली या विचलन नहीं हुआ करता था.
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इस कानून का उद्देश्य बांधों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत और संस्थागत कार्ययोजना उपलब्ध कराना है। भारत में बांधों की सुरक्षा के लिए कानून की कमी के कारण यह चिंता व विचार का मुद्दा था। खासतौर से बड़े बांधों का निर्माण देश में बड़ी बहस और विवाद के मुद्दे
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संविधान हमारे जीवन जीने के मार्ग को प्रशस्त करता है और जीवन के विकास को दिशा देता है. बाबासाहब ने ऐसे ही संविधान की रचना की और द्वेषमुक्त समाज की रचना की राह दिखाई. किसी के साथ कोई अन्याय न होने पाए..न जाति, न धर्म और न भाषा के नाम पर! उन्होंने जीवन
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यूरोपीय संघ उत्तर-अफ्रीकी देशों को आपस में जोड़नेवाला एक भूमध्यसागरीय महापथ भी बनानेवाला है। यूरोपीय संघ की यह उदारता सर्वथा सराहनीय है लेकिन हम यह न भूलें कि यूरोप की समृद्धि का रहस्य उसके पिछले 200 साल के उपनिवेशवाद में भी छिपा है।
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