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क्या डेनमार्क का अनुकरण करेगा भारत ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: February 21, 2025 06:53 IST

कुछ दशक पहले तक ऐसा नहीं था. भ्रष्टाचार था लेकिन सीमित था. मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य सचिव या पुलिस का मुखिया, सरकार के कई विभागों के प्रमुख लगभग हमेशा ईमानदार होते थे.

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अभिलाष खांडेकर

विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग भारत के लिए अक्सर भारी अपयश लेकर आती हैं. चाहे महिलाओं के खिलाफ अत्याचार हो, वायु प्रदूषण का बदतर स्तर हो या शिक्षा का खराब स्तर, भारत किसी भी साल कुछ खास उम्मीद नहीं जगाता.

हर वर्ष यह बदनामी भ्रष्ट देशों की वैश्विक सूची को लेकर और अधिक  होती है. बर्लिन स्थित गैरसरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) द्वारा हाल ही में जारी की गई सूची में भारत के बारे में धारणा सूचकांक एक ऐसे देश के लिए कोई खुशी की बात नहीं है, जिसके पास कथित तौर पर ‘ईमानदार’ सरकार है. भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (पीसीआई) सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के कथित स्तरों के आधार पर विभिन्न देशों को रैंकिंग देता रहा है.

भारत 180 देशों की सूची में 96वें स्थान पर है जो ऐसी बात नहीं है जिस पर भाजपा सरकार को गर्व होना चाहिए. दुर्भाग्य से, बहुत से लोग ऐसी रैंकिंग से परेशान नहीं होते क्योंकि उन्हें लगता है कि हमारे यहां भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं हो सकता. यह निराशावाद सभी के लिए खतरनाक है.

समाज में गहरी जड़ें जमाए बैठी इस हताशा से लगता है कि भारतीयों को इसके साथ ही जीना होगा. वे पूरी तरह से असहाय दिखते हैं. पिछले 75 सालों में बनाए गए सभी भ्रष्टाचार विरोधी कानून और संस्थाएं, दुखद रूप से, अप्रभावी साबित हुई हैं और इसी वजह से ऐसी धारणाएं पैदा होती हैं.

भ्रष्टाचार विरोधी नारे पर सवार होकर भाजपा ने 2014 में दिल्ली की सत्ता झपट ली थी. इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) द्वारा समर्थित भाजपा के अभियान ने यह धारणा बनाई थी कि निवर्तमान मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार गहरे भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी. भाजपा ने बड़ी चतुराई से लोगों को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि कांग्रेस पूरी तरह से भ्रष्ट है तथा एक और मौका पाने लायक नहीं है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हें व्यक्तिगत रूप से ‘मिस्टर क्लीन’ के नाम से जाना जाता है, ने फिर अभूतपूर्व ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का नारा दिया जिससे आम लोगों में उम्मीद जगी, जो राजनीतिक और नौकरशाही के भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने यह कहकर उम्मीदों को और बढ़ाया कि कालाधन पूरी तरह खत्म हो जाएगा और फिर 2017 में नोटबंदी अचानक लागू कर दी. आज, सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, अधिकांश कालाधन बाजार में वापस आ गया है. राजनीतिक भ्रष्टाचार अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है, साथ ही निर्वाचित सरकारों को गिराने और अन्य बड़े घोटालों के बारे में खबरें भी जो भाजपा शासित राज्यों में बार-बार आती हैं, जनता को दुखी करती हैं. लगता है ‘न खाऊंगा...’ वाला  नारा एक और ‘जुमला’ साबित हुआ है.

सवाल यह है कि कौन ज्यादा भ्रष्ट है? राजनेता या नौकरशाह? सरकारी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र? ‘टीआई’ द्वारा जारी ‘पीसीआई’ सूची निजी क्षेत्र को नहीं छूती है, बल्कि दुनिया भर में सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करती है. इसमें कहा गया है कि दुनिया में डेनमार्क सबसे कम भ्रष्ट देश है, उसके बाद फिनलैंड और सिंगापुर हैं. ‘टीआई’ शोध से पता चलता है कि भारत के पड़ोसी हमसे ज्यादा भ्रष्ट हैं.

भ्रष्टाचार एक अभिशाप है, यह मुद्रास्फीति को बढ़ाता है, अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सीमित करता है; अमीरों को और अधिक अमीर बनाता है और शक्तिशाली लोगों को और अधिक भ्रष्ट बनाता है क्योंकि यह किसी मंत्री, मुख्यमंत्री, नगर निरीक्षक (टीआई), खाद्य निरीक्षक, डॉक्टर, परिवहन विभाग के अधिकारी या सरपंच की ‘शक्ति’ होती है जो उन्हें अवैध धन दिलाती है. रिश्वत देने वाला या तो असहाय होता है या वह सरकारी अधिकारी और मंत्री से कोई ठेका या सौदा हासिल करना चाहता है.

लचर भारतीय कानून, हर तरह के लालची राजनीतिज्ञों का समूह और गिरती हुई ईमानदारी ने मिलकर भारत को इतना भ्रष्ट बना दिया है कि लोगों को यह दृढ़ता से लगता है कि सरकारी व्यवस्था में कोई भी काम संबंधित अधिकारी को रिश्वत दिए  बिना नहीं हो सकता - एक साधारण क्लर्क से लेकर सिस्टम के शीर्ष अधिकारी तक. किसी भी भारतीय राज्य में कोई भी विभाग अपवाद नहीं है!

अगर किसी भी तरह से शीर्ष अधिकारी ईमानदार है, तो हमारा तंत्र सुनिश्चित करता है कि वह अधिकारी या मंत्री हर तरह से विफल हो जाए. एक ईमानदार राजनेता या अधिकारी हमारे तंत्र में जीवित नहीं रह सकता और यह हमारे देश के लिए सबसे दुखद त्रासदी है. कुछ दशक पहले तक ऐसा नहीं था. भ्रष्टाचार था लेकिन सीमित था. मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य सचिव या पुलिस का मुखिया, सरकार के कई विभागों के प्रमुख लगभग हमेशा ईमानदार होते थे. लेकिन यह प्रवृत्ति अब आमूल-चूल बदल गई है और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अधिक से अधिक कानून बनाए जाने के साथ यह और भी बिगड़ती चली गई.

कुछ अपवादों को छोड़कर, 50-100 करोड़ रुपए या उससे अधिक की हैसियत वाले आईएएस/आईपीएस अधिकारी और इंजीनियरों को अब ‘न्यू नॉर्मल’ माना जाता है. मध्य प्रदेश में, परिवहन विभाग में एक छोटे से कर्मचारी सौरभ शर्मा ने भाजपा शासन में कई सौ करोड़ की संपत्ति अर्जित की. कैसे? सरकार में कोई बोलने वाला नहीं है. किसने उसका समर्थन किया, किसी को नहीं पता. चिंताजनक बात यह है कि विभिन्न राज्यों में लोकायुक्त और भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाएं भ्रष्ट लोगों में कोई भी भय पैदा नहीं कर सकी हैं.

भाजपा के नेतृत्व में भारत को ‘अमृत काल’ में डेनमार्क के करीब आने का प्रयास करना चाहिए तथा भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहिए. देश का आम आदमी यही चाहता है.

 

 

 

 

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