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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं पर लगाम

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: August 13, 2021 09:28 IST

भारतीय राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं के सक्रिय रहने की बात नई नहीं है। इसे रोकने को लेकर कई बार पहले भी बातें होती रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का आदेश महत्वपूर्ण है।

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हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने वह काम कर दिखाया है, जो हमारी संसद और विधानसभाओं को कभी का कर देना चाहिए था. उसने आदेश जारी कर दिया है कि चुनावी उम्मीदवारों के नाम तय होने के 48 घंटे में ही पार्टियों को यह भी बताना होगा कि उन उम्मीदवारों के खिलाफ कौन-कौन से मुकदमे चल रहे हैं और उसके पहले वे कौन-कौन से अपराधों में संलग्न रहे हैं. 

सभी पार्टियां अपनी वेबसाइट पर उनका ब्यौरा डालें और उसका शीर्षक रहे, ‘आपराधिक छविवाले उम्मीदवार का ब्यौरा’. चुनाव आयोग एक ऐसा मोबाइल एप तैयार करे, जिसमें सभी उम्मीदवारों का विस्तृत विवरण उपलब्ध हो. आयोग आपराधिक उम्मीदवारों के बारे में जागरूकता अभियान भी चलाए. 

साथ ही पार्टियां पोस्टर छपवाएं, अखबारों में खबर और विज्ञापन दें. पार्टियां अपनी चालबाजी छोड़ें. छोटे-मोटे अखबारों में विज्ञापन देकर खानापूर्ति न करें. वे बड़े अखबारों और टीवी चैनलों पर भी आपराधिक उम्मीदवारों का परिचय करवाएं. इन सब बातों पर निगरानी रखने के लिए चुनाव आयोग एक अलग विभाग बनाए.

अब देखना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों का पालन कहां तक होता है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि किसी भी नेता के विरुद्ध चल रहे आपराधिक मामलों को कोई भी राज्य सरकार तब तक वापस नहीं ले सकती, जब तक कि उस राज्य का उच्च न्यायालय अपनी अनुमति न दे दे. 

अभी क्या होता है? सरकारें अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों के खिलाफ जो भी मामले अदालतों में चल रहे होते हैं, उन्हें वापस ले लेती हैं. ऐसे मामले पूरे देश में हजारों की संख्या में हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले से नेताओं, पार्टियों और सरकार पर अंकुश लगा दिया है. 

बिहार के चुनाव में कांग्रेस, भाजपा और राजद के लगभग 70 प्रतिशत उम्मीदवारों के विरुद्ध मुकदमे चल रहे थे. इन पार्टियों ने अपने आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का विवरण प्रकाशित ही नहीं किया. इसीलिए अदालत ने कुछ पार्टियों पर एक लाख और कुछ पर पांच लाख रु. का जुर्माना ठोंक दिया है. सभी प्रमुख पार्टियां दोषी पाई गई हैं. 

हमारे लोकतंत्र के लिए यह कितने शर्म की बात है कि बहुतेरे सांसद और विधायक अपराधों में संलग्न पाए जाते हैं. यह तो सभी पार्टियों का प्रथम दायित्व है कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपना चुनाव उम्मीदवार बनाना तो दूर, उन्हें पार्टी का सदस्य भी न बनने दें. 

चुनाव आयोग ऐसे उम्मीदवारों पर पाबंदी इसलिए नहीं लगा सकता कि कई बार उन पर झूठे मुकदमे दर्ज करवा दिए जाते हैं और कई बार ऐसे अभियुक्त रिहा भी हो जाते हैं लेकिन पार्टियां चाहें तो ऐसे नेताओं की उम्मीदवारी पर प्रतिबंध लगा सकती हैं.

टॅग्स :सुप्रीम कोर्टबिहार विधान सभा चुनाव 2020भारतीय जनता पार्टीआरजेडी
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