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ब्लॉग: बार-बार रास्ते ही बदल लेते हैं अपनी जगह

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 29, 2024 10:25 IST

कभी सुशासन के लिए पहचान रखने वाले नीतीश कुमार लगातार पाला बदलने से अपनी छवि की एक पहचान को टिका नहीं पा रहे हैं।

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ठळक मुद्देबिहार में राज्य सरकार के सत्ता समीकरण बदल चुके हैंनीतीश कुमार नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैंभाजपा के साथ वह ताल ठोंककर 2024 के लोकसभा चुनाव में उतरेंगे

कई महीनों की चर्चाओं के बाद बिहार में राज्य सरकार के सत्ता समीकरण बदल चुके हैं। चौथी बार पलटी मारने के बाद नीतीश कुमार नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें नीतीश कुमार की हैं और कुछ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हैं। मगर उनसे बढ़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की भी कुछ बयानी है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अधिक परेशानी इंडिया गठबंधन की है, जिसके आगे बढ़ने के पहले ही साथी बिछड़ने लगे हैं और नीतीश कुमार पर पहले उनके गठबंधन के साथी टिप्पणी करते थे, अब तो इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) के साथी भी पानी पी-पी कर उन्हें कोसने में जुट गए हैं, जिनमें एक शिवसेना (उद्धव बालासाहब ठाकरे) भी है, जिसका बिहार से नाता जगजाहिर है। 

किंतु सारी उठापटक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति का हर बार का रास्ता अब भी अबूझ पहेली ही बना हुआ है। वह जिस तरफ चलते हैं, थोड़े समय के बाद रास्ता ही अपनी जगह बदल लेता है और वह उस दिशा को छोड़ किसी दूसरी ओर मुड़ जाते हैं। एक समय उन्हें भाजपा का रास्ता अपनी मंजिल पर ले जाता दिख रहा था, उसके साथ चलते-चलते अचानक ही सड़क छोड़ कहीं और मुड़ गए, जहां उन्हें राजद का रास्ता अच्छा दिखने लगा। थोड़े समय चलने के बाद उन्हें लगा कि राजद के रास्ते ने उन्हें छोड़ दिया तो अब दूसरा रास्ता भाजपा का दिखने लगा और उस पर चलने की तैयारी कर ली। उनकी अदला-बदली पर कांग्रेस नेता उन्हें गिरगिट का खिताब दे रहे हैं, तो शिवसेना (उद्धव ठाकरे) नेता उन्हें भूलने की बीमारी का शिकार बता रहे हैं। मगर आरोपों से बेपरवाह नीतीश कुमार फिर से ‘इंडिया’ का दामन त्याग कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल हो चुके हैं। 

भाजपा के साथ वह ताल ठोंककर 2024 के लोकसभा चुनाव में उतरेंगे। इसके बावजूद कभी सुशासन के लिए पहचान रखने वाले नीतीश कुमार लगातार पाला बदलने से अपनी छवि की एक पहचान को टिका नहीं पा रहे हैं। राजनीति अवसरों के साथ चल सकती है, लेकिन केवल मौकों की तलाश से विश्वसनीयता का संकट खड़ा होता है। भाजपा हो या राजद, दोनों ही दलों से उनकी पहचान न तो नई है और न ही दोनों को एक-दूसरे के बारे में कुछ कम मालूम है। 

इस परिस्थिति के बावजूद बार-बार नए समीकरण तैयार कर सरकार को अस्थिर और फिर स्थिर बनाने का गणित समझ के बाहर है। हालांकि भाजपा का सारा हिसाब-किताब लोकसभा चुनावों के आस-पास है, जिसमें वह सफलता हासिल कर रही है। परंतु नीतीश कुमार पर उठते सवाल और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के भविष्य को लेकर आशंकाओं को हमेशा ही बल मिलता रहेगा। एक नया जोड़ीदार मिला है तो पता नहीं कब दूसरा फिर मिलेगा। कभी रास्ते बदलेंगे या राहें ही अपनी जगह बदल लेंगी। बिहार का खेल समझने में मुश्किलें हमेशा ही बनी रहेंगी।

टॅग्स :बिहारनीतीश कुमारBJPलोकसभा चुनाव 2024नरेंद्र मोदी
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