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लोकतंत्र में विपक्ष कम महत्वपूर्ण नहीं 

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: February 26, 2026 07:40 IST

नेता विपक्ष सामान्य सदस्य नहीं होता. जहां उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझेगा, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का भी दायित्व बनता है कि वह नेता प्रतिपक्ष की महत्ता को समझे.

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लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा गया है. संभवत: मार्च के दूसरे सप्ताह में सदन में इस पर बहस होगी और लोकसभा में सरकारी पक्ष और विपक्ष के गणित को देखते हुए यह लगभग तय है कि प्रस्ताव अस्वीकृत ही होगा. स्पीकर ओम बिरला पर विपक्ष ने पक्षपातपूर्ण आचरण और नेता प्रतिपक्ष को न बोलने देने का आरोप लगाया है. यह पहली बार नहीं है कि हमारी लोकसभा में अध्यक्ष पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगा है. अब तक तीन बार इस आशय के प्रस्ताव सदन में रखे गए हैं.  

वस्तुतः पहली लोकसभा में ही सन्‌ 1954 में तत्कालीन अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आया था. फिर 1966 और 1987 में ऐसे प्रस्ताव रखे गए. तीनों ही बार यह प्रस्ताव संख्याबल के आधार पर खारिज हो गया था. पर यह बात अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि लोकसभा के सदस्यों ने अपने विवेक के आधार पर ऐसा प्रस्ताव रखना जरूरी समझा था.

जब पहली बार लोकसभा के अध्यक्ष के खिलाफ इस आशय का प्रस्ताव आया तो 479 सदस्यों वाले सदन में सत्तारूढ़ कांग्रेस के 364 सदस्य थे. प्रस्ताव का अस्वीकृत होना स्पष्ट था. जब इस पर बहस हुई तो उपाध्यक्ष ने दो घंटे का समय निर्धारित किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उपाध्यक्ष से आग्रह किया था कि सत्तारूढ़ पक्ष को कम बोलना स्वीकार होगा,  आप विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए अधिकाधिक समय दें! देश के प्रथम प्रधानमंत्री का यह कथन हमारी जनतांत्रिक परंपरा का एक ज्वलंत उदाहरण है.  

इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम आज की स्थिति को देखते हैं तो कुछ हैरानी होना स्वाभाविक है, और कुछ पीड़ा का अनुभव करना भी. आज विपक्ष का आरोप है कि उसे सदन में बोलने नहीं दिया जाता.

जनतंत्र संवाद के माध्यम से चलता है. देश के मतदाता ने सरकार को ही नहीं चुना, विपक्ष को भी चुना है. इसलिए दोनों को अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए. आज विडंबना यह भी है कि विपक्ष न बोलने देने की शिकायत कर रहा है और सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि विपक्ष सदन की कार्रवाई नहीं चलने दे रहा! बहरहाल, सदन में एक अराजकता -सी स्थिति पैदा हो गई है.

यह स्थिति बदलनी ही चाहिए और इसका एकमात्र उचित तरीका यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करने की जनतांत्रिक परंपरा का निर्वाह करें. जब सदन में बात करने का अवसर नहीं मिलता तो बात सड़क पर होती है. और कई बार यह बात बहुत आगे बढ़ जाती है.  

लोकसभा में एक लंबे अर्से से सही तरीके से काम नहीं हो पा रहा. विपक्ष द्वारा मचाए जाने वाले शोर-शराबे से किसी को ऐतराज हो सकता है,  पर जनतांत्रिक परंपराओं का तकाजा है कि नेता विपक्ष को बोलने न देने के आरोप को गंभीरता से लिया जाए. नेता विपक्ष सामान्य सदस्य नहीं होता. जहां उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझेगा, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का भी दायित्व बनता है कि वह नेता प्रतिपक्ष की महत्ता को समझे.

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