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ब्लॉगः गुजरात चुनाव में हर पांच में से एक उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि वाला, राजनीति से कैसे मिटे दागी उम्मीदवारों का दाग?

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: December 3, 2022 15:45 IST

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार गुजरात में विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों में खड़े कुल 1621 उम्मीदवारों में से बीस प्रतिशत यानी हर पांच में से एक उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि वाला है। यह अध्ययन उम्मीदवारों द्वारा स्वयं भरे गए नामांकन पत्रों में दी गई जानकारी के आधार पर किया गया है।

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नेता और प्रतिनिधि में क्या अंतर होता है? नेता वह है जो नेतृत्व करे, अपनी कथनी और करनी से उदाहरण बने आम जनता के लिए। जनता जिस पर भरोसा कर सके, जिसकी ओर उम्मीदों से देख सके। और प्रतिनिधि? प्रतिनिधि वह है जिसे किसी काम-विशेष के लिए जनता नियुक्त करे। इस दृष्टि से देखें तो नेता भले ही जनता का सेवक न माना जाए, पर विधानसभा और संसद आदि में जनता का प्रतिनिधि सेवक ही होता है। जनतंत्र में यह सेवक जनता स्वयं चुनती है। और इस चुनाव का आधार सेवक बनने के उम्मीदवार की वैयक्तिक योग्यता और चरित्र होता है। होना तो यही चाहिए। पर क्या मतदाता चयन के अपने अवसर और अधिकार का सही दृष्टि से उपयोग करता है? यह सवाल आज अचानक अखबार में एक समाचार पढ़कर मन में उठा। खबर गुजरात में हो रहे चुनाव के उम्मीदवारों से जुड़ी थी।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार गुजरात में विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों में खड़े कुल 1621 उम्मीदवारों में से बीस प्रतिशत यानी हर पांच में से एक उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि वाला है। यह अध्ययन उम्मीदवारों द्वारा स्वयं भरे गए नामांकन पत्रों में दी गई जानकारी के आधार पर किया गया है। पता यह चला है कि 1621 उम्मीदवारों में से 268 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर गंभीर से अति गंभीर अपराधों के आरोप हैं। निस्संदेह, इनमें ऐसे लोग भी होंगे जिन पर राजनीतिक स्वार्थों के चलते आरोप लगे हों, पर यह तो नहीं ही कहा जा सकता कि सारे आरोप राजनीतिक कारणों अथवा वैयक्तिक रंजिशों से उपजे होंगे। जो आरोप गुजरात में चुनाव लड़ रहे लोगों पर लगे हैं, उनमें हत्या, बलात्कार आदि के आरोप भी शामिल हैं। यह एक गंभीर स्थिति है, क्योंकि इन्हीं आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो चुनाव जीत कर विधानसभा में हमारे प्रतिनिधि बनकर बैठेंगे और दावा यह भी करेंगे कि वे हमारे नेता हैं।

यह पहली बार नहीं है जब उम्मीदवारों अथवा प्रतिनिधियों की आपराधिक पृष्ठभूमि से संबंधित बातें सामने आई हैं। लगभग हर चुनाव में, चाहे वह म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हो या लोकसभा का, इस तरह के अध्ययन होते रहे हैं, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं की सूचियां प्रकाशित होती रही हैं और कुछ ऐसे उम्मीदवार चुनाव जीतते भी रहे हैं। सवाल उठता है कि राजनीतिक दलों के समक्ष ऐसी क्या मजबूरी होती है कि उन्हें दागी उम्मीदवारों का सहारा लेना पड़ता है? राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के चलते नहीं चाहेंगे कि स्थिति बदले, पर जागरूक मतदाता ऐसे उम्मीदवारों का बहिष्कार करके अवश्य स्थिति बदल सकते हैं। 

टॅग्स :गुजरात विधानसभा चुनाव 2022राजनीतिक किस्सेगुजरात
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