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एन.के. सिंह का ब्लॉगः एकल नेतृत्व के गुण-दोष नजर आ रहे हैं

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: November 18, 2018 05:18 IST

क्या वजह है कि एक सीबीआई का मुखिया डायरेक्टर वर्मा अपने स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना के यहां छापा पड़वा दे और अगले दिन स्पेशल डायरेक्टर उसके कार्यालय पर?

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देश में एक अजीब वातावरण बन रहा है जो आजादी के बाद पहली बार देखने को मिल रहा है. संस्थाएं एक-दूसरे की कमीज गंदी करने में लगी हैं, भले ही इस प्रक्रिया में उनकी अपनी कमीज के दाग भी दिखाई देने लगे हैं और कमीज पहले से ज्यादा बदरंग होती गई है. पहली बार देश की सबसे मकबूल संस्था सुप्रीम कोर्ट जो अंतिम सहारा माना जाता है- के चार जज प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और वह भी अपने ही प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ. 

पहली बार रिजर्व बैंक पर अपना नियंत्नण स्थापित करने के लिए सरकार ने आरबीआई एक्ट-1938 की धारा-7 का इस्तेमाल किया जिसे स्वतंत्न भारत में तो छोड़िए परतंत्न भारत में भी नहीं किया गया था. पहली बार जांच के लिए बनी देश की सबसे भरोसे की संस्था सीबीआई के दो अधिकारी इस तरह लड़ते हैं कि उस कीचड़ के छींटे रॉ, प्रवर्तन निदेशालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ही नहीं केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और यहां तक कि प्रधानमंत्नी कार्यालय (पीएमओ) तक को सराबोर कर देते हैं. 

पहली बार सामूहिक रूप से कई गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों ने दिल्ली पुलिस एक्ट के सेक्शन-5 में प्रयुक्त अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सीबीआई को अपने राज्य में प्रवेश न देने की धमकी दी है. आंध्र और पश्चिम बंगाल ने तो कर भी दिया है. सच बात यह है कि पता नहीं अंग्रेजों ने हिंदू-मुसलमानों को कितना लड़ाया, लेकिन भारतीय समाज में पहली बार आज हर व्यक्ति या तो इस खेमे में है या उस.  

ऐसा हुआ कैसे और क्यों? दरअसल भारत में आज भी जनता की नजरों में व्यक्ति दल के मुकाबले, भावना तर्क के मुकाबले और एकल नेतृत्व सामूहिक नेतृत्व के मुकाबले प्रबल है. सन 2013-14 का समय याद कीजिए. नरेंद्र मोदी में जनता ने हर समस्या का इलाज देखा. मोदी ने भी उन्हें वैसा ही भरोसा दिलाया. ‘‘उन्हें 50 साल दिया, मुङो सिर्फपांच साल दे दो’’, ‘‘मैं आपके चौकीदार की तरह काम करूंगा’’ की चुनावी अपील में  जनता के उसी भरोसे को और पांच साल बनाए रखने का अनुरोध था. जनता ने उन्हें पांच साल दिए. वह प्रधानमंत्नी बने. 

जाहिर था अगर उन भरोसों पर खरा उतरना है तो पहले अपना घर साफ रखना होगा. एक भ्रष्ट सिस्टम में चौकीदारी का वादा बेहद मुश्किल वादा था. चूंकि ऐसे में अपने साये पर भी भरोसा नहीं होता इसलिए मोदी ने एकल नेतृत्व और एक भरोसेमंद और सक्षम अफसरों का समूह पीएमओ में स्थापित किया. मंत्रियों के बीच एक दहशत का माहौल बना. पत्ता भी हिलना इसी एकल नेतृत्व की मंजूरी से होने लगा. दरअसल, यह सबसे कारगर उपाय था त्वरित विकास के लिए. अगर इस व्यवस्था की जगह मंत्रियों को खुली छूट होती और अगर गलती से भी एक मंत्नी किसी भ्रष्टाचार के आरोप में फंसता तो इमेज ‘चौकीदार’ की खराब होती और मोदी का यूएसपी ढह जाता. शुरू में खुफिया विभाग ने कुछ मंत्रियों के रिश्तेदारों को लेकर एक-दो मामले की जानकारी दी भी जिसके बाद प्रधानमंत्नी का अलर्ट होना स्वाभाविक भी था. 

लेकिन एकल शासन के अभ्यासकर्ता को यह भी देखना जरूरी होता है कि जो गैर-औपचारिक संस्थाएं भ्रष्टाचार-मुक्त, बेहतर और तेज कार्य-निष्पादन के लिए विकसित की गई हैं वे निर्द्वद्व होने की वजह से स्वयं तो अहंकारी नहीं हो गई हैं. लार्ड एक्टन का ‘शक्ति भ्रष्ट करती है और निर्बाध शक्ति पूरी तरह भ्रष्ट’ का सिद्धांत कहीं प्रभावी तो नहीं हो रहा है? यहां भ्रष्ट का मतलब अहंकार से है. कहीं कोई गुजरात कैडर का अधिकारी या प्रधानमंत्नी की तथाकथित नजदीकी का दावा करने वाला वर्ग अन्य समकक्ष को डरा तो नहीं रहा है. वास्तव में मोदी का ‘एकल नेतृत्व’ का प्रयोग एकमात्न विकल्प था. लेकिन इसकी मियाद होती है. प्रजातंत्न में यह कुछ वर्षो के लिए ही किया जा सकता है. और जैसे ही ‘देश को भ्रष्टाचार-रहित, तेज और संतुलित विकास’ मिलने लगे, इसे खत्म कर पूर्व की औपचारिक संस्थाओं को बहाल कर दिया जाता है. एक और शर्त होती है. इन नए गैर-औपचारिक संस्थाओं में बैठे ‘ताकतवर’ अफसरों के आचार-व्यवहार पर लगातार नजर रखना होता है भले ही पूर्व में उसका रिकॉर्ड अच्छा रहा हो. 

क्या वजह है कि एक सीबीआई का मुखिया डायरेक्टर वर्मा अपने स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना के यहां छापा पड़वा दे और अगले दिन स्पेशल डायरेक्टर उसके कार्यालय पर? ये दोनों तो पीएमओ ने ही चुने थे. क्या ये दोनों हाल में भ्रष्ट हुए? अगर हुए तो फौरन गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया. ‘चौकीदार’ के कान में जब ये आवाज आई तो उसने क्यों नहीं डंडा फटकार कर एकल सिस्टम में लगे अपने लोगों (पीएमओ) को सावधान किया. 

 मोदी की व्यक्तिगत छवि आज चौकीदार की ही है और तीव्र, भ्रष्टाचार-शून्य विकास के लिए एकल नेतृत्व आज की जरूरत भी है. लेकिन बहुत जल्द कुछ कमियों को दूर न किया गया तो यह आभास होगा कि चौकीदार ईमानदार तो है पर सही समय पर सीटी बजाकर सचेत नहीं करता और डंडा फटकार कर चोरों में अपने जगे रहने का डर भी नहीं पैदा करता. 

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