अगले साल भारत की जनगणना होनी है. एक दशक के अंतराल पर होने वाला यह भगीरथ प्रयास देश की विशाल जनसंख्या के बारे में आधारभूत जानकारी जुटाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है. यह काम देश में रहने वाले सभी जनों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और विभिन्न प्रकार की नागरिक सुविधाओं आदि के बारे में आंकड़ों को जानने के लिए महत्वपूर्ण है. इनके आधार पर भविष्य की जरूरतों के बारे में पूर्वानुमान लगा कर नीतियों और आवश्यक योजनाओं को बनाया जाता है. साथ ही इनकी सहायता से समाज में आ रहे परिवर्तनों की पैमाइश और समझ भी विकसित होती है.
इस जनगणना को जाति के आधार पर आयोजित करने के लिए मांग पहले भी उठती रही है और वर्तमान लोकसभा में भी इसका जिक्र अभी आया है.
जाति भारतीय समाज के लिए एक अभिशाप समझी जाती है जिससे भेद-भाव पैदा होता है. वह तमाम तरह के अमानवीय अत्याचारों और विषमताओं की जड़ में है. उसे ऊंच-नीच का आधार बना कर हायरार्की में नीचे के पायदान पर स्थित जातियों का बहुत दिनों से शोषण होता रहा है. लेकिन आधुनिक शिक्षा, नगरीकरण और भौगोलिक गतिशीलता के चलते इनमें उल्लेखनीय बदलाव आया है और अंतर्जातीय संबंध भी बढ़ रहे हैं.
इन पारंपरिक जाति की श्रेणियों के दायरे घट बढ़ रहे हैं किंतु जाति का नया, अधिक प्रभावी और सेक्युलर किस्म का वर्गीकरण सुदृढ़ हो रहा है. इसके अंतर्गत भारतीय समाज की संवैधानिक श्रेणियां आती हैं जिसका मुख्य आधार जन्म से कहीं अधिक हमारे राजनैतिक विमर्श के साथ संगति है. इनका मूल प्रयोजन पिछड़ों को सामथ्र्य देना था. अब यह सत्ता समीकरण से भी जुड़ गया है.
वोट, आर्थिक लाभ, नौकरी के अवसर का आकर्षण इतना है कि इन श्रेणियों में शामिल होने के लिए कई समुदाय आंदोलन करते हैं और सरकार द्वारा अपने विवेक से इनका निपटारा किया जाता है. फलत: इन श्रेणियों में जातियों का समावेश राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के दस्तावेजों में भिन्न-भिन्न पाया जाता है. ऐसे में संविधान की जातिमुक्त भारत और समता, समानता तथा बंधुत्व वाले लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने वाले समाज की संकल्पना को भारी क्षति पहुंच रही है. उसकी जगह हम प्रखर जातिवाद और गहन रूप से जातिकेंद्रित समाज को तरजीह देते जा रहे हैं.