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ब्लॉग: महान गोदावर्मन के ऋणी हैं हम

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 1, 2024 10:48 IST

लुप्तप्राय होते जा रहे विशाल भारतीय जंगलों को शायद एक बार फिर से नया जीवन मिल गया है, इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को धन्यवाद, जिसने इसे लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

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ठळक मुद्देलुप्तप्राय होते जा रहे विशाल भारतीय जंगलों को शायद एक बार फिर से नया जीवन मिल गया हैइसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को धन्यवाद, जिसने इसे लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया हैजलवायु परिवर्तन के इस दौर में यह हम सभी के लिए काफी खुशी की बात है

लुप्तप्राय होते जा रहे विशाल भारतीय जंगलों को शायद एक बार फिर से नया जीवन मिल गया है, इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को धन्यवाद, जिसने फैसला सुनाया है कि वनों का ‘शब्दकोशीय अर्थ’ ही, जैसा कि कुछ साल पहले शीर्ष अदालत ने निर्धारित किया था, राज्यों द्वारा वनों पर लागू करना होगा।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जिसे सभी ने देखा है, यह हमारे लिए काफी खुशी की बात है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद, न्यायाधीशों ने केंद्र सरकार से कहा कि वह 1995 के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुम्पुलपाद बनाम भारत संघ मामले में जो फैसला सुनाया गया था, उस पर कायम रहे, जिसने वनों - बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा - के संरक्षण के प्रति पूरे दृष्टिकोण को बदल दिया था।

भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी अशोक कुमार शर्मा की जनहित याचिका में वन संरक्षण अधिनियम 2023 के संशोधन को चुनौती दी गई थी, जिसमें अदालत ने कहा कि ‘फिलहाल जंगल का देशव्यापी व्यापक अर्थ बना रहेगा, जिसमें पूरे भारत में 1.97 लाख वर्ग किलोमीटर की अघोषित वन भूमि शामिल है।’ ऐसे समय में यह एक बड़ी राहत है जब बड़े वन क्षेत्र अन्य विकल्पों पर विचार किए बिना ‘विकास’ का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं अर्थात कटते जा रहे हैं। वनों द्वारा मनुष्यों को प्रदान की जाने वाली पर्यावरण सेवाएं अमूल्य हैं। इन्हें किसी के द्वारा, विशेषकर सरकारों के द्वारा, नष्ट करने का अधिकार ही नहीं है।

अधिनियम में संशोधन और धारा 1ए के सम्मिलन ने वनों की परिभाषा को सीमित या काफी हद तक कमजोर कर दो श्रेणियों में सीमित कर दिया है- वनों और वनों के रूप में दर्ज भूमि और 1980 के बाद सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भूमि, दोनों को। दूरदर्शी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, जिन्होंने भावी पीढ़ियों के लिए वनों के महत्व को महसूस किया था, वे ऐतिहासिक वन संरक्षण अधिनियम 1980 लेकर आई थीं लेकिन इससे भी कई राज्यों में अवैध कटाई नहीं रुकी, जिसके कारण वनों के लिए लड़ने वाले गोदावर्मन (उनका 2016 में 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया) को इस मामले को बहुत साल पहले सर्वोच्च न्यायालय में उठाना पड़ा। अगर वे न होते तो आज हम जो जंगल देखते हैं, वे बहुत जल्दी लुप्त हो गए होते।

गोदावर्मन ने स्वतंत्र भारत में वनों की रक्षा के लिए एक महान सेवा प्रदान की है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जंगलों के अंदर पेड़ों की कटाई और गैर-वानिकी गतिविधियों को तत्काल रोका जाए। मील का पत्थर साबित होने वाले इस आदेश ने उस समय के वनों के ‘व्यावहारिक’ अर्थ को, जैसा कि राज्य सरकारें समझती थीं, फिर से परिभाषित किया। यह वह समय था जब अधिकांश राज्यों में कानूनी या अवैध रूप से जंगलों की कटाई हो रही थी, जैसा कि आज महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दक्षिणी राज्यों, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में हो रहा है।

गोदावर्मन केरल के एक शाही परिवार के वंशज थे; वह केरल और तमिलनाडु के नीलगिरि में जंगलों की अंधाधुंध कटाई से व्यथित थे। एक सच्चा राष्ट्रवादी होने के नाते वह चाहते थे कि जंगल सुरक्षित रहें और वे न्याय के लिए लड़ते रहें। यह वन प्रेमियों द्वारा दायर किए गए हजारों अंतर्वर्ती आवेदनों के साथ सबसे लंबे समय तक चलने वाला वन मसला बन गया था। हिमालयी राज्यों और मैदानी इलाकों में वानिकी और विभिन्न स्थानीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों को देखते हुए मामला लगभग 20 वर्षों तक खिंच गया।

अवैध खनन, अवैध कटाई, अतिक्रमण, वन प्रबंधन और संरक्षित क्षेत्र जैसे मुद्दे अदालत में इस दौरान उठाए गए। सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 में एक केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया और इस विशाल कार्य में सहायता के लिए हरीश साल्वे को ‘एमिकस क्यूरी’ भी नियुक्त किया। इसके परिणामस्वरूप कुद्रेमुख क्षेत्र में खनन और संवेदनशील अरावली पहाड़ में संगमरमर का खनन बंद हो सका। जस्टिस वर्मा ने पहली बार जो कहा था (वनों का शब्दकोशीय अर्थ लागू किया जाए) उसे मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने दोहराया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अब राज्यों पर लगाम कसनी होगी।

हालांकि वास्तविक त्रासदी यह है कि अधिकांश राज्यों में वन मंत्री अक्षम हैं और जंगलों को बचाने के अपने मुख्य काम की वास्तव में परवाह नहीं करते हैं। मध्य प्रदेश में, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विदिशा जिले में, पेड़ों की बड़े पैमाने पर अवैध कटाई और ताजा कटे हुए लकड़ी के लट्ठों को बाइक पर ले जाते हुए कैमरे में कैद किया गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

बड़वानी में आदिवासियों और स्थानीय लोगों के बड़े समूहों ने जंगलों पर धावा बोल कर पेड़ों को काट डाला लेकिन स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। जब मीडिया ने शोर मचाया तो डीएफओ को बलि का बकरा बना दिया गया और दो ताकतवर अधिकारियों- कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को छोड़ दिया गया। वनों की रक्षा करना राज्यों का काम है, जो वे वोटों के चक्कर में नहीं कर रहे हैं. यह खतरनाक है. इसे समझना होगा।

टॅग्स :Forest Departmentsupreme courtEnvironment Department
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