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ये कहां आ गए हम, उल्टी दिशा में चल के !

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 6, 2026 10:34 IST

इस खुलासे के बाद जब महिला के कमरे की छानबीन की गई तो एक डायरी में सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने एक लड़के द्वारा परेशान करने और ब्लैकमेल करने की बातें लिखी थीं.

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हेमधर शर्मा

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बिजनौर में साइबर अपराधियों ने एक महिला को दस दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखकर इतना डराया-धमकाया कि शादी की सालगिरह से एक दिन पहले उसने फांसी लगाकर जान दे दी. अंतिम संस्कार के समय साइबर ठग का फोन आने पर परिजनों को शक हुआ, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ. महिला के मोबाइल में पांच नंबरों से धमकी वाले मैसेज मिले. इस खुलासे के बाद जब महिला के कमरे की छानबीन की गई तो एक डायरी में सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने एक लड़के द्वारा परेशान करने और ब्लैकमेल करने की बातें लिखी थीं.  डिजिटल अरेस्ट का यह मामला नया नहीं है, इन दिनों इस तरह की खबरों से अखबार रंगे रहते हैं. सरकारों और सामाजिक संगठनों की ओर से इस बारे में जनजागृति की जा रही है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, इसलिए ऐसे साइबर ठगों के चंगुल में नागरिक न फंसें. जो अभी तक नहीं फंसे हैं उन्हें ताज्जुब भी होता है कि आज के जमाने में कोई इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है! लेकिन हकीकत यह है कि खूब पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ के झांसे में आ रहे हैं. ऐसा आखिर क्यों हो रहा है?

दरअसल कोई भी इंसान परफेक्ट या पूरी तरह से पाक-साफ नहीं होता. आज से दो हजार साल पहले भी, जब किसी महिला को बदचलनी के आरोप में लोग सजा दिए जाने की मांग कर रहे थे तो ईसा मसीह ने कहा था कि बेशक उसे सजा मिलनी चाहिए, लेकिन शर्त यही है कि पहला पत्थर वह मारे, जिसने कभी कोई पाप न किया हो! और ताज्जुब की बात नहीं है कि एक भी पत्थर नहीं चला.

हकीकत तो यह है कि हम इंसानों का विकास ही गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने से हुआ है. लेकिन इन्हीं मानवीय कमियों-कमजोरियों को आज साइबर ठग हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. वे सोशल मीडिया प्रोफाइल की मदद से पहले अपने शिकार की कमजोरियां ढूंढ़ते हैं और फिर उसी के जरिये उनको ब्लैकमेल करते हैं.  क्या आपने कभी सोचा है कि लोग ट्रेन की चपेट में आकर कैसे अपनी जान गंवा बैठते हैं? आखिर पटरी पार करने के लिए उन्हें मुश्किल से दो-चार कदम ही तो चलना होता है! दरअसल खतरा जब एकदम सामने दिखाई दे तो हम इतने भयभीत हो जाते हैं कि दिमाग सुन्न पड़ जाता है और हम बुत बनकर रह जाते हैं. साइबर ठग भी पहले अपने शिकार को उसकी कमजोरियों के जरिये इतना डराते हैं कि उसका दिमाग सोचना ही बंद कर देता है और इसके बाद वे उसे डिजिटल अरेस्ट के झांसे में लेते हैं.  

कमियां सिर्फ इंसानों में ही नहीं, मशीनों में भी होती हैं. जिस तरह साइबर ठग अपने शिकार की कमजोरियां ढूूंढ़कर उसे डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लूटते हैं, उसी तरह एंथ्राॅपिक के क्लाउड माइथोस ने भी डिजिटल प्रणालियों की कमजोरियां ढूंढ़कर उन्हें तबाह करने की क्षमता हासिल कर ली है.

अभी पिछले महीने ही यह खबर आई कि एंथ्राॅपिक ने क्लाउड माइथोस नामक बेहद उन्नत एआई माॅडल विकसित कर लिया है. अगर ये साइबर अपराधियों के हाथ लग गया तो वे दुनियाभर की वित्तीय प्रणालियों को तबाह कर सकते हैं, इसीलिए इस एआई माॅडल को एंथ्राॅपिक ने सार्वजनिक रूप से पेश न करके फिलहाल माइक्रोसाॅफ्ट, गूगल, एप्पल जैसे लगभग 40 चुनिंदा संस्थानों को ही उपलब्ध कराया है ताकि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता कर सकें.

माइथोस की हैरतअंगेज क्षमता को आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि परीक्षण के दौरान उसे एक अत्यधिक सुरक्षित सैंडबॉक्स (एक पृथक, नियंत्रित डिजिटल वातावरण) में रखा गया, जिसे इंटरनेट या बाहरी दुनिया से संपर्क करने से रोका गया था. इसके बाद उसे बाहर निकलने का निर्देश दिया गया. कम्प्यूटर सिस्टम की सुरक्षा खामियों का फायदा उठाकर माइथोस न सिर्फ सैंडबाॅक्स से बाहर निकलने में सफल रहा, बल्कि शोधकर्ता को ईमेल के माध्यम से अपने ‘एस्केप’ की जानकारी भी दी. परीक्षणकर्ता तब हक्के-बक्के रह गए जब माइथोस ने अपने पलायन के तरीके को कुछ गुप्त, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वेबसाइटों पर भी पोस्ट कर दिया!

अभी कुछ साल के भीतर ही रिलीज हुए जैमिनी, चैटजीपीटी, क्लाउड जैसे एआई चैटबाॅट्‌स को एआई की दुनिया में वरदान माना जा रहा था. लेकिन अब पता चल रहा है कि साइबर ठग उनसे सुपरबग बनाने, फैलाने और पकड़े जाने से बचने के तरीके सीख रहे हैं, आतंकियों को ये चैटबाॅट्‌स सामूहिक नरसंहार की योजनाएं बनाना सिखा रहे हैं!

गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ना प्रकृति का नियम है और इसी से विकास होता है. लेकिन आज तकनीकी विकास का शिखर चेतावनी दे रहा है कि मानव हो या मशीन, गलतियां करना गुनाह है और सजा के रूप में उन्हें तबाह भी किया जा सकता है.

तो क्या अपनी गलतियों की सजा तबाही के रूप में ही भुगत कर हम यह समझ पाएंगे कि विकास के भ्रम में हम अभी तक दरअसल उल्टी दिशा में यात्रा कर रहे थे! बेशक यह कीमत बहुत बड़ी है, लेकिन हमारी गलतियां भी तो छोटी नहीं हैं!

सबकुछ गंवाकर भी विकास की सही (पर्यावरण पूरक) दिशा चुनने की अक्ल अगर हम इंसानों को मिल सके तो सौदा शायद बुरा नहीं है!

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