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कुछ जानवरों के नामों में छिपे शब्दों की उत्पत्ति में बंधे हैं उनसे हमारे पुराने रिश्तों के धागे

By भाषा | Updated: August 2, 2021 19:58 IST

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वायन जर्राह शास्त्रवान, रिसर्च एसोसिएट, सिडनी विश्वविद्यालय

मेलबर्न, दो अगस्त (द कन्वरसेशन) वनों में रहने वाले बहुत से जानवरों में कुछ जैविक रूप से इनसानों के बहुत करीबी रिश्तेदार है, लेकिन यह भी सच है कि इनसानी खतरों के कारण उनमें से कुछ हमारे इस ग्रह पर अपने अस्तित्व पर मंडराते खतरे से जूझ रहे हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया में कई अनोखी जंगली प्रजातियां हैं, और इन वन्य प्राणियों के लिए हमारे कई अंग्रेजी शब्दों की उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशियाई भाषाओं से हुई है। अंग्रेजी बोलने वालों की जुबान घुमा देने वाले इन शब्दों का अपनी मूल भाषाओं में सारगर्भित अर्थ हैं।

इन नामों की दक्षिणपूर्व एशियाई व्युत्पत्तियों की खोज करके, हम समझ सकते हैं कि सदियों से मनुष्यों ने वन प्राणियों के साथ सम्मान और आत्मीयता के संबंध कैसे बनाए रखे हैं। और, चूंकि यह पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर खतरे में हैं, इसलिए हमारे सबसे लुप्तप्राय रिश्तेदारों से संबंधित एक अलग तरीके को पहचानना महत्वपूर्ण है।

यहाँ, मेरी पसंदीदा दक्षिण पूर्व एशियाई वन प्रजातियों में से चार के नाम हैं, और हम उनके नामों की उत्पत्ति के बारे में क्या जानते हैं।

ऑरंगउटान

ऑरंगउटान महान वानर परिवार से संबंधित हैं, जो हमारे सबसे करीबी जैविक रिश्तेदार हैं। हमारी यह रिश्तेदारी ऑरंगउटान शब्द में ही परिलक्षित होती है, जिसे मलय बोलने वाले आज भी ओरंग हुतान वाक्यांश से व्युत्पन्न के रूप में पहचान सकते हैं, जिसका अर्थ है ‘‘वन व्यक्ति’’।

मेरे हालिया शोध से पता चलता है कि यह शब्द एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है, जो इस पारंपरिक धारणा के विपरीत है कि इसे 17 वीं शताब्दी में इंडोनेशिया में यूरोपीय आगंतुकों द्वारा गढ़ा गया था।

आश्चर्यजनक रूप से, ऑरंगउटान शब्द का उपयोग करने वाला सबसे पुराना उपलब्ध ग्रंथ सुमात्रा या बोर्नियो से नहीं आया है, जहां आज ऑरंगउटान रहते हैं, बल्कि यह पड़ोसी द्वीप जावा से है। ऑरंगउटान का उल्लेख करने वाले सबसे पुराने ग्रंथों में से एक 9वीं शताब्दी की रचना रामायण है। पुरानी जावानीस भाषा में लिखी गई रचना में ‘‘ऑरंगउटान, सभी दाढ़ी वाले, ऊपर चढ़ने’’ का वर्णन किया गया है।

ऑरंगउटान शब्द पुराने जावानीस में आधुनिक मलय से संबंधित एक अन्य पुरातन भाषा से आया था। इन शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि यह शब्द एक हजार साल पहले द्वीपसमूह की भाषाओं में मौजूद था।

‘‘वन व्यक्ति’’ वाक्यांश के रूप में यह उत्पत्ति कई सदियों से दिखाती है कि दक्षिण पूर्व एशियाई लोगों ने वनों में रहने वाले मानव जैसे जीवों के रूप में वनमानुषों को देखा है।

गिबन्न या लंगूर

गिबन्न एक प्रकार के वानर होते हैं जो आदर्श रूप से दक्षिण पूर्व एशिया के जंगलों में दिखाई देते हैं। गिब्बन शब्द 18वीं शताब्दी में फ्रेंच के माध्यम से यूरोपीय भाषाओं में प्रवेश कर गया।

फ्रेंच ने इसे मलय शब्द, केबोन से अपनाया। लेकिन हाल के शोध से पता चलता है कि यह मलय शब्द मूल रूप से उत्तरी असलियन नामक भाषाओं के समूह से आया है, जो प्रायद्वीपीय मलेशिया में स्वदेशी समुदायों द्वारा बोली जाती है। उत्तरी असलियन में, शायद इसे केबोंग कहा जाता था।

अंग्रेजी में जिसे गिबन्न कहते हैं, कई दक्षिण पूर्व एशियाई भाषाएं इसे वाक-वाक कहती हैं। गिब्बन दक्षिण पूर्व एशिया में ही एक अपेक्षाकृत दुर्लभ शब्द है। यह 18वीं शताब्दी के बाद मलय में भी उपयोग से बाहर हो गया था। क्षेत्र की भाषाओं में अधिक सामान्य शब्द वाक-वाक है।

ऑरंगउटान की तरह, यह शब्द भी पुरानी जावानीस भाषा में 9वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रकट होता है और ऐसा लगता है कि गिबन्न चूंकि कौवे जैसी ध्वनि निकालते हैं इसलिए उनका उस ध्वनि से मिलता जुलता नाम पड़ गया।

अपने शोध के माध्यम से, मेरा सुझाव है कि वाक-वाक शब्द ने वाकवाक ट्री की मध्य पूर्वी किंवदंती को प्रेरित किया हो सकता है: एक सुदूर पूर्वी भूमि का एक काल्पनिक वृक्ष जिसके फल से मानव सिर और शरीर उत्पन्न होते हैं जो रोते हुए ‘‘वाक वाक’’ की ध्वनि निकालते हैं। यूरोपीय विज्ञान द्वारा जानवर की पहचान किए जाने से कई सदियों पहले गिब्बन के तीव्र क्रंदन की लोक यादें हिंद महासागर में मौजूद हो सकती थीं।

बिंटुरॉन्ग

बिंटुरॉन्ग, जिसे अंग्रेजी में बियरकैट्स या भालू के रूप में भी जाना जाता है, पेड़ों पर रहने वाले लंबे और भारी जीव होते हैं। इनकी लंबी पूंछ होती है, जिसका इस्तेमाल यह संवाद करने के लिए करते हैं। बिंटुरॉन्ग शब्द पहली बार 19वीं शताब्दी में मलय भाषा से अंग्रेजी में दिखाई दिया।

बिंटुरॉन्ग शब्द सुमात्रा और बोर्नियो की कई तरह की भाषाओं में भी दिखाई देता है। इससे पता चलता है कि यह शब्द इस क्षेत्र के इतिहास में बहुत पहले गढ़ा गया था: शायद कई सहस्राब्दी पहले, इन भाषाओं का विचलन शुरू होने से पहले।

बिंटुरॉन्ग पेड़ से पेड़ पर छलांग नहीं लगाता, बल्कि जमीन के साथ अपना रास्ता बनाता है। इस शब्द का सबसे प्रारंभिक रूप जिसे हम जानते हैं, वह था मटुरुन, जिसका अर्थ शायद ‘‘वह जो उतरता है’’। इसे बोर्नियो और सुमात्रा की कई भाषाओं द्वारा अपनाया गया था, जो नियमित ध्वनि परिवर्तनों की एक श्रृंखला से गुजर रहा था। इस तरह मलय रूप बिंटुरॉन्ग विकसित हुआ, जिसे बाद में अंग्रेजी ने अपनाया।

पेड़ों पर रहने वाले कई अन्य जीवों के विपरीत, बिंटुरॉन्ग शाखाओं के बीच फुर्ती से छलांग नहीं लगाते हैं। बल्कि, वे एक पेड़ से नीचे उतरते हैं और जमीन के साथ दूसरे पेड़ पर चलते हैं। माटुरुन नाम की उपयुक्तता हमें दिखाती है कि ये प्रारंभिक दक्षिण पूर्व एशियाई समुदाय जानवरों के व्यवहार के करीबी पर्यवेक्षक थे।

स्यामंग

लुप्तप्राय स्यामंग गिब्बन का सबसे बड़ा प्रकार है। उनका रंग विशिष्ट रूप से काला होता है और वह एक जटिल प्रणाली के साथ संवाद करते हैं।

शब्द का अंतिम मूल शब्द शायद अमंग है, जो सेंट्रल एस्लियन समूह की कई स्वदेशी भाषाओं में पाया जाता है।

जब मलय बोलने वालों ने अमंग शब्द उधार लिया, तो उन्होंने इसमें शुरू में स जोड़ लिया, जिसे आदरसूचक माना जाता था। मलय अभिव्यक्ति को अंततः एकल शब्द स्यामंग के रूप में माना गया।

ये चंद नाम मनुष्यों और हमारे वन वानर रिश्तेदारों के बीच आत्मीयता की एक और मजबूत डोर बांधते हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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